अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आधी धूप... आधी छाँव... !!












आधी धूप...
आधी छाँव...


मन का
आधा-अधूरा...
उजड़ा गाँव...


चल रहे हैं समेटते...
टुकड़े आस्था-विश्वास के...
इस रस्ते... हम सब खाली पाँव... !!

*** *** ***

रास्ते... जिनसे हम कई बार गुजरते हैं... कभी कभी तो एक ही दिन में कई बार और फिर भी कहीं नहीं पहुँचते... फिर भी जाने क्यूँ हारती हुई आस सजग हो चुन लेती है कोई टुकड़ा धूप का और बुन लेती है अगले दिन के लिए उत्साह... जीवन कभी रुकने नहीं देता किसी मोड़... विवशता कचोटती ज़रूर है... मन थकता भी है... पर फिर चल पड़ता है... जीवन के ताने बाने यूँ उलझाये रखते हैं और हम चलते चले जाते हैं... कि चलते जाना ही एकमात्र विकल्प है... 



4 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 30 सितंबर 2015 को 4:17 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2115 में दिया जाएगा
धन्यवाद

रश्मि प्रभा... 30 सितंबर 2015 को 8:07 pm  

रास्ते तो वही हैं जो विरासत में मिले
पर चौराहों पर मन कई बार ठिठका है
सीधे जाऊँ
बायें - दायें
या लौट जाऊँ - इस प्रश्न पर
उधेड़बुन में रहा है मन
विरासत की ऊँगली थामे रही !

जब जब बाधा आई तो उड़ने की कोशिश की
लेकिन जमीन पर ऐतबार रहा
विरासत ने रास्तों को गुम नहीं होने दिया

Anita 1 अक्तूबर 2015 को 5:33 am  

पहुँचना कहीं नहीं है..याद नहीं राम विश्राम में ही मिलते हैं..

Madan Mohan Saxena 1 अक्तूबर 2015 को 10:56 am  

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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