अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इस्ताम्बुल:"लोनली प्लानेट"... !!


आधी अधूरी यह पोस्ट भी उस दिन ही तैयार थी... सोचा था उसी दिन शाम तक पोस्ट भी हो जाएगी... पर टल गयी बात... और रात आ गयी... दो एक दिन मन यूँ ही डूबा रहा... खोया रहा बस ऐसे ही... फिर रात, चाँद और एक अकेले तारे को तकते हुए कुछ लिख गया... लिखी बात खुद को सांत्वना देने को ही लिख गयी... खुद को ही तो बहलाने समझाने को घटित होता है लेखन...
जाने कितना समझे हम... जाने कितना उबरा मन...
खैर, अब इन बातों को यहीं विराम दे कर लौटते हैं डेढ़ वर्ष पूर्व की गयी यात्रा के 'उस' पड़ाव तक... जिसे "लोनली प्लानेट" भी कहा जाता है...
*** *** ***
सुबह सुबह प्रारंभ हुई यात्रा सूर्य के विदा होने तक चलने वाली थी... फिर यात्री वापस एअरपोर्ट पहुंचा दिए जाने वाले थे... जहाँ से सब अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाने थे...!

एअरपोर्ट से ही एक परिचय यूँ ही हमारी निधि बन गया... दोस्त, तुम मिली तो यूँ गिरते पड़ते ठीक ठाक ही तय हो गया सफ़र... यूँ अचानक मिलने का शुक्रिया... जाने अब भी तुम स्टॉकहोम में हो या नहीं... फिर मिलना भी तो नहीं हुआ... हमारी सब प्लानिंग धरी की धरी रह गयी... !कितना कुछ बस सोच कर ही रह जाते हैं हम... वास्तविकता में बातें कभी आकार ले ही नहीं पातीं... खैर, याद कर रहे हैं वह संयोग... हम दोनों ही शोर्ट नोटिस पर यात्रा कर रहे थे... और उद्देश्य भी एक ही था... विवाह अटेंड करना...! ये भी एक संयोग ही था कि इस्ताम्बुल से कनेक्शन फ्लाईट थी... और दिन भर का अवकाश भी था भ्रमण के लिए... !

मित्र, ये तुम्हारी उपस्थिति ही थी कि इतनी तस्वीरें हैं आज मेरे पास जिसमें हम और सुशील जी एक साथ उपस्थित हैं... नहीं तो ऐसा होना अक्सर दुर्लभ ही होता है तस्वीरों में! तुम्हें याद कर पुनः मिलने की सम्भावना को मन में बचाए रखने की युक्ति लगा रहे हैं...


बढ़ते हैं अब इस्ताम्बुल की ओर... जहाँ बस पर बैठे फुहारों में भीगते हुए हम चले जा रहे थे... गाइड अपनी रफ़्तार में कई जानकारियां दिए चला जा रहा था... भीड़ को सभी बातों पर अमल करने की सलाह दी जा रही थी क्यूंकि लिमिटेड समय था और देखने को बहुत कुछ था... हर जगह उतरना इसलिए संभव नहीं था क्यूंकि पार्किंग की समस्या होती... और न भी होती तो इतना समय ही कहाँ था... सो सहमतियाँ बनती गयीं और ऐसे कुछ ही स्थान थे जहां हम उतरे... शेष अवलोकन सवारी पर से ही हुआ...!
जो जैसे याद आ रहा है लिखते चले जाएँ... है तो इतना कुछ कि मन कन्फ्यूज़ हो जाता है... तभी तो इतना वक़्त लगा... वक़्त ही नहीं मिला, इस बीच कितनी ही यात्राएं हो गयीं मन ही मन घर की... भारत की... !!!

अब जरा लौटते हैं पुनः उसी बस पर जहाँ गाइड की आवाज़ गूँज रही है... वह अपनी गति से बोले चला जा रहा है... रूटीन चीज़ ही ऐसी है... यंत्रवत हो जाता है इंसान... यात्रा इन सबसे मुक्त करती है... कि वह रूटीन का हिस्सा नहीं होती... वह कई अनिश्चितताएं साथ लाती है... कई बार सरप्राइज़ भी करती है और बहुत संभव है कभी कभार यात्रा यंत्रणा भी हो जाये पर यंत्रवत होने से बचाती भी है... आज़ाद करती है... अपनी परिधि से निकल कर देखने परखने समझने की दृष्टि देती है... !!
हम बस से उतर कर अब इस्ताम्बुल की सड़कों पर झम झम बारिश में इधर उधर टहलते हुए छतरी बेचने वालों से बचते हुए चलने का भरसक प्रयास कर रहे थे... एक एक को कम से कम दस छतरी वाले छतरी खरीद लेने की गुज़ारिश कर रहे थे... प्रयास करना उनका काम है कि हर कोई संभावित ग्राहक ही तो था... हमको तो छतरी लेनी ही नहीं थी कि भींगने का अपना ही मज़ा है... गाइड भी यूँ ही भींगते हुए यंत्रवत बोले चले जा रहा था...

अब तथ्यगत बातें अगली कड़ी में... कुछ एक स्थानों का विवरण... स्पंदित जीवन... सब अगली बार... सब कुछ लिखना तो शेष ही है अभी भी कि अब तक तो मन का भटकाव ही दर्ज हो पाया है... इस्ताम्बुल तो बाकी है अभी!

7 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 10 सितंबर 2015 को 7:29 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.09.2015) को "सिर्फ कथनी ही नही, करनी भी "(चर्चा अंक-2095) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

ब्लॉग बुलेटिन 10 सितंबर 2015 को 5:45 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, परमवीरों को समर्पित १० सितंबर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रश्मि शर्मा 10 सितंबर 2015 को 6:05 pm  

अच्‍छा लगा इस्‍ताम्‍बुल की सैर कर।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 11 सितंबर 2015 को 12:50 pm  


आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-09-2015) को "हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने से परहेज क्यों?" (चर्चा अंक-2096) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मन के - मनके 11 सितंबर 2015 को 10:28 pm  

Beautiful memories.

प्रतिभा सक्सेना 12 सितंबर 2015 को 4:22 am  

अच्छे रहे सारे अनुभव.

Onkar 12 सितंबर 2015 को 5:32 am  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

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