अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

क वि ता


'क'रते रहे
'वि'रल अनुभूतियों की व्याख्या...


'ता'रते रहे...
पार उतारते रहे खुद को ही
भावों के, सागर में, डुबो कर...



लिखते रहे
कलम की नोक को
ओस में, भिगोकर...


कविता के तीनों अक्षरों और दोनों मात्राओं में ढूंढते रहे आकाश
बांधते रहे आकाश सा विस्तार... 


ऐसे ही कर लिए हमने कितने ही सागर पार...


अब जो तट पर बैठे हैं...



पत्थर चुन रहे हैं...
अनमने से हम, अपना ही मन बुन रहे हैं...


कविता के
'क','वि', और 'ता'
मेरे आसपास
विम्ब रच रहे हैं...

हम जो कहीं नहीं हैं,
मात्र कविताओं में बच रहे हैं... !!

5 टिप्पणियाँ:

Onkar 19 सितंबर 2015 को 3:50 pm  

बहुत बढ़िया

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 19 सितंबर 2015 को 6:55 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-09-2015) को "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." (चर्चा अंक-2104) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

JEEWANTIPS 20 सितंबर 2015 को 7:51 am  

बहुत ही उम्दा भावाभिव्यक्ति....
आभार!
इसी प्रकार अपने अमूल्य विचारोँ से अवगत कराते रहेँ।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

abhishek shukla 20 सितंबर 2015 को 12:41 pm  

बहुत सुन्दर।

Anita 24 सितंबर 2015 को 10:49 am  

यह बचना ही शाश्वत है..

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