अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यात्रा, पड़ाव और उलझा मन: इस्ताम्बुल


आधी रात को बुरा स्वप्न जगा दे... रोते हुए उठ बैठे हों और कुछ भी समझ न आ रहा हो कि क्या करें... किसे उठाएं... किसे जगाएं फ़ोन घुमा कर... तब मन की कितनी अजीब  दशा होती है...
ओह! बारह बज  रहे हैं और रोते रोते उठ बैठे हैं हम, ये तसल्ली तो है कि चलो सपना ही था... पर... खैर, अभी खुद को समझा ही रहे हैं कि कुछ देर रुक जाओ... घंटे दो घंटे में तो भारत में सुबह हो हो जाएगी... फिर बात हो जाएगी मम्मी से... फ़ोन तो अभी भी कर लें पर वो ये आधी रात को की हुई रिंग उनको चिंता में डाल देगी न... :(
मन को हटाना है... और वो हटता ही नहीं... जहाँ अटक जाता है, वहीँ अटका रह जाता है... रे मन! चल अधूरी यात्रा ही पूरी कर ले... कैसे कैसे तो लिख ही डाले न तुमने इस्ताम्बुल के चार किश्त... अब डेढ़ साल पुरानी भारत यात्रा के इस अद्भुत पड़ाव की संभावित अंतिम कड़ी लिख ही डाल... कि तथ्यों और यादों में उलझेगा तो शायद सुबह तक का सफ़र तुम्हारे लिए कुछ कुछ सुलझ जायेगा...
चलते हैं इसी बहाने इस्ताम्बुल... वहीँ जहां पिछली कड़ी में विराम लिया था... !!
गिरे थे... दर्द से रोते हुए चल रहे थे... सुशील जी मेरी हर बदमाशी  का खूब रिकॉर्ड रखते हैं... उस समय भी वो क्लिक ही कर रहे थे मेरा रोना... याद आती है उनकी बात "अरे मत रो, गिरने पड़ने में तो तुम तेज़ हो और बहादुर भी... रोती हुई कैसी तस्वीर आएगी... बंद करो रोना... etc. etc. etc." वेल, कुछ समय तो लगा था चुप होने में... गिरने में हम माहिर हैं तो रोने धोने में भी कम कहाँ हैं... !! खैर... आगे बढ़ते हुए अब चलते हैं Hagia Sofia की ओर... 


मूलतः यह ईमारत एक चर्च थी, कालांतर में मस्ज़िद हुई और अब एक म्यूजियम है... छठी इसवी में यह Byzantine सम्राट Justinian the Great द्वारा बनवाई गयी थी... 



सुल्तान अहमद मस्ज़िद अपनी दीवारों के नीले रंग के कारण नीली मस्ज़िद भी कहा जाता है... यह तुर्की की एक मात्र मस्ज़िद हैं जिसमें छह मीनार हैं...

यूँ इन भव्यताओं से गुजरते हुए अब हम लगभग इस पड़ाव की यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे... यहाँ दो घंटे  का वक़्त था हमारे पास... अपने अपने तरीके से यात्री इस समय का उपयोग करें... इसी इंस्ट्रकसन के साथ हमारे गाइड ने हमसे विदा ली...!

हम खड़े थे बहुत ही व्यस्त इलाके में... खूब चहल पहल थी...

यह है ग्रैंड बाज़ार का दृश्य. यह दुनिया के मोस्ट विजिटेड पर्यटन स्थलों की सूची में पहले नंबर पर है... प्रतिदिन ढाई लाख से चार लाख लोग आते हैं... इस विशाल मार्किट में लगभग ६१ कवर्ड स्ट्रीट्स हैं और ३ हज़ार दुकानें... !! पूरा घूमना तो संभव नहीं था पर यहाँ काफ़ी समय बिताया था हमने... कुछ कुछ छोटी मोटी सौगातें भी लीं थीं... कुछ अपने लिए... कुछ अपने अपनों के लिए... !!

सागर का दृश्य... पुल और दो महाद्वीप के बीच बंटा एक शहर और कितने कितने महाद्वीपों में बंटा मन... यही सब जोड़ घटाव करते हुए हम समय का भी हिसाब लगा रहे थे... शाम हो चली थी और दौड़ते हुए पुल को कवर कर के वापस यथास्थान लौटना था... जहाँ से बस हमें वापस एअरपोर्ट पहुंचाने वाली थी...


अंतिम समय की भागा भागी याद है अब भी... बस छूट जाने की आशंका ने हमको उस दर्द में भी अच्छा खासा दौड़ लगाने की हिम्मत दे दी थी... सच ही है, परिस्थितियां अन्तःस्थितियों को दृढ करती हैं और हम हर हाल में सुबह से शाम तक का सफ़र तय कर ही लेते हैं... !!

3 टिप्पणियाँ:

सुनीता 15 सितंबर 2015 को 3:22 am  

सुन्दर संस्मरण

कालीपद "प्रसाद" 15 सितंबर 2015 को 4:26 am  

खुबसूरत चित्रों के साथ सजीव यात्रा वर्णन -सुन्दर

रश्मि प्रभा... 15 सितंबर 2015 को 7:40 am  

परिस्थिति और एक मामूली खेल अनजाने बहुत ताकतवर बनाती है … बचपन में गिर जाओ तो सब कहते हैं "बहादुर बच्चा,इसे चोट नहीं लगती,मारो जमीन को …" यह वाक्य अपरोक्ष रूप से एक सीख देता है,
डरना नहीं,गिरने से घबराना नहीं, उठना - सामने आई बाधा से जूझना, तुम बहादुर हो,अपनी ताकत को पहचानो"
… माँ कैसी हैं ? सब सकुशल न ?

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