अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चलते चलते... !!


रात एग्यारह बजे के आसपास से ही बारिश हो रही है... मन अन्यान्य चिंताओं से घिरा बरस रहा है... ये बरस कर चिंतन तक की राह तय कैसे करे यही विचार रहे हैं कांच पर पड़ी बूंदों को एक टक ताकते हुए...  .... !
कृष्ण जन्म की रात के कितने ही विम्ब हैं मन में... पढ़ा हुआ... देखा हुआ... सुना हुआ... कैसी अँधेरी रात रही होगी न... मुसलाधार बारिश... कारागार में जन्म... देवकी माँ से यशोदा मैया तक की यात्रा... योगमाया का अवतार... !

लोककल्याण हेतु धरा पर जन्म लेने वाले प्रभु ने कितनी लीलाएं की... सभी लीलाओं से भक्तों को विभोर किया... गीता अवतरित हुई... हम धन्य हुए...!
अर्जुन सा समर्पण हो, कृष्ण आज भी हमारा रथ हांकने को खड़े है... सुदामा सा सखाभाव हो तो प्रभु की कृपा प्राप्त हो... गोपियों सी भक्ति हो तो प्रभु स्वयं प्रगट हो जायें... हममें आपमें से ही... किसी का रूप धर कर; ये सब क्या कहने लिखने की ही बातें हैं..., नहीं न... ??? ये अनुभूतियों के सत्य हैं... जिनकी कोई प्रामाणिकता नहीं, लेकिन जिनसे बड़ा सत्य भी , अन्य कुछ नहीं... !!
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रात का अँधेरा... नीरव शान्ति... बूंदों की आवाज़... कल्पना में कहीं बजती बांसुरी की कोई धुन... और क्षण क्षण सरकता जीवन... ! कब कहाँ कैसे किधर निकल जाये राह... कब किससे  जुड़ जाए मन... कब किससे टूट जाए मन... क्या परिस्थितियां उत्पन्न हो कि अन्तःस्थिति घुटने टेक दे... और जूझता मन अशांति से भर जाए... ये सब स्थितियां कब कैसे प्रकट होंगी कोई नहीं जानता... ! ठीक रहते रहते... सब अकस्मात् बिगड़ जाता है... फिर तकते रहते हैं हम आसमान... मुट्ठी भर शांति की तलाश में...!
कहते हैं खुद के भीतर ही ढूंढना है जो भी ढूंढना है... तो अगर शान्ति की तलाश है तो वह भी भीतर ढूँढने पर ही मिलेगी... हे आकश! हे आकाश सी संभावनाओं वाले कृत संकल्पों! हमें राह दिखाओ कि क्रोध और अशांति से जूझते हुए मन प्रांत में हम जरा सी रौशनी ढूंढ कर प्रत्यारोपित कर सकें... ज़रा सी आस बचाए रखना कि हम इन घोर अंधेरों में जीवन की ओर विश्वास भरी दृष्टि से देख सकें...
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यूँ लिखते सोचते जाने कब सुबह हो गयी...
सुबह आश्वस्त करती है... एक नए दिन का आगमन हमेशा नयी आशाएं लेकर आता है भले ही दिन कितना ही उदास क्यूँ न हो... गगन कितने ही काले बादलों से क्यूँ न आच्छादित हो... समय की एक यही प्रकृति कितनी बड़ी आशा है कि ये जो भी है, ये ऐसा नहीं रहेगा... नित परिवर्तनशील वक़्त इन काले बादलों को उड़ा ले जायेगा और लालिमा बिखरेगी... धरा मुस्कुराएगी......
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चलते चलते रात ने...
प्रभात पर
अपना जीवन वार दिया...

सवेरा
ऐसा भाव विह्वल हुआ

उसने
रात्रि की अंतिम बेला को
अंक लगा कर तार दिया... !!

3 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash 6 सितंबर 2015 को 9:43 am  

बेहतरीन अभिव्यक्ति अनु जी।
आपका लिखा हुआ पढ़ने का अलग ही आनंद है।


सादर

Anita 6 सितंबर 2015 को 9:58 am  

आस्था और विश्वास से भरे सुंदर भाव..

संजय भास्‍कर 7 सितंबर 2015 को 6:26 am  

सुंदर भाव..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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