अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बाक़ी है सफ़र...

निरुद्धेश्य
पटरियों के आस पास चलते हुए
ट्रेन पर सवार हो गयी...



पन्ने पलटती हुई चेतना
कुछ दूर तक गयी...

फिर वापसी की राह ली



कि लौटना ज़रूरी था... !


दिन के ख़ाके में कितने ही ऐसे चाहे अनचाहे मोड़ थे
जिनसे गुज़रना नियति थी...



सो पन्नों के बीच बुकमार्क लगाया
बेचैनी को ज़रा फुसलाया 



और लौट आये घर...
कि अभी लम्बी है डगर...


बिना लक्ष्य के
निकले थे भटकने...
कि जुटा सकें कुछ धैर्य
और ज़रा सी हिम्मत...



निर्धारित गंतव्य की यात्रा हेतु!


कि अभी बाक़ी है सफ़र...
अनदेखे हैं कितने ही आनेवाले पहर... !!

3 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 3 सितंबर 2015 को 11:23 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.09.2015) को "अनेकता में एकता"(चर्चा अंक-2088) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 सितंबर 2015 को 2:56 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-09-2015) को "राधाकृष्णन-कृष्ण का, है अद्भुत संयोग" (चर्चा अंक-2089) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा शिक्षक-दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अनुपमा पाठक 4 सितंबर 2015 को 3:32 pm  

शास्त्री जी, आपको भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं!
राधे कृष्ण!

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