अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्... !!


जीवन कितनी दूर ले आता है हमें... समय कहाँ कैसे कब क्या प्रस्तुत करेगा, कोई नहीं जानता... ऐसे में कुछ एक मंत्रोच्चार से भाव हमें हमारे बचपन से... हमारे घर से जोड़े हुए है...
बालसुलभ कुछ लकीरें खिंची... मन ही मन मधुराष्टकम गाया अपने भाई बहनों के साथ... 
ये यूँ मेरी तुच्छ कोशिशें अंकित हो जाये यहाँ भी... कि लौटना चाहता है मन... उन दिनों में... जब प्रसाद पाने के लिए आधी रात तक जागते थे हम और उत्साह में मम्मी के साथ निर्जला व्रत भी रख लेते थे...

*** *** ***
सभी को कृष्णाष्टमी की शुभकामनाएं!
हरि ॐ तत्सत्!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 6 सितंबर 2015 को 10:06 am  

कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें..कृष्ण ने किस तरह हर भारतीय के दिल को जोड़ रखा है न..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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