अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इस्ताम्बुल: इतिहास के तहख़ाने से... !!


बहुत पुराना... बहुत बहुत पुराना था वह मंज़र... इतिहास के किन तहखानों से तथ्य निकाल कर जैसे सामने रखे जा रहे थे... ज्यादातर पहले से तथ्यों को पढ़कर ही पहुंचना सही होता है... कि यह सहजता और समझ दोनों देता है... नहीं तो तथ्यों के चक्कर में दृश्य छूट जाते है और दृश्य की ओर दृष्टि हो तो तथ्य मिस हो जाते हैं... खैर, लौट कर इत्मीनान से पढ़ा सब और अभी दोहराये कितना कुछ पहले का लिखा हुआ कि लिख सकें यहाँ कुछ कुछ वैसा ही जैसा उस वक़्त देखा समझा था... चुटके पुर्जे निश्चित काम आते हैं... इनकी उपयोगिता हमेशा सिद्ध हुई है... !!

Basilica Cistern की ओर चलते हैं... यह अद्भुत जगह थी... इतिहास भी इसका अनूठा ही है... ५३२ इसवी में निर्मित इस भूमिगत संरचना में ३३६ कॉलम प्रयुक्त हैं...

कहते हैं इस सिस्टर्न को ग्रेट पैलेस और आसपास के भवनों की सेवा हेतु बनाया गया था... ब्लैक सी के पास के जलाशय से २ ० किलोमीटर जलसेतु के माध्यम से जल पहुँचता था और लगभग ८० ००० क्यूबिक मीटर जल स्टोर करने में सक्षम थी यह संरचना! Byzantine सम्राटों के ग्रेट पैलेस से रीलोकेट होते ही इसे बंद कर दिया गया और कालांतर में लोग इसे भूल गए... !! Petrus Gyllius ने Byzantine पुरावशेषों  पर शोध के दौरान इसे १५४५ में ढूंढ निकाला... स्थानीय लोगों का कथन था कि वे तहखानों में बाल्टी डालकर चमत्कारिक रूप से जल प्राप्त करने में सक्षम थे... और कुछ ने तो मछलियाँ प्राप्त करने की बात की भी पुष्टि की... !! Gyllius ने बड़े परिश्रम से किसी एक तहखाने के भीतर इस तथाकथित रहस्यमय तालाब को ढूंढ तो लिया लेकिन इस संरचना को सम्मान नहीं दिला पाए... तुर्कों ने बहुत बाद तक इसे डंपिंग ग्राउंड की तरह इस्तमाल किया... कबाड़ भी और यहाँ तक की लाशें भी डंप की जाती रहीं...
१९८५ में तालाब को साफ़ किया गया... महानगर पालिका द्वारा पुनर्निर्मित किये जाने के बाद १९८७ में इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया और आज यह शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है... !

लकड़ी के उठे हुए प्लेटफार्म पर घूमना विरल अनुभव था... छत से पानी टपकता रहता है... इसी फिसलन में बहुत जोर से गिरे थे हम... आज भी काले निशान गए नहीं हैं... :( हाथ में छोटा कैमरा था... जो पानी में जाते जाते बचा था... :)

मछलियाँ तैरती हुईं दिख जाती हैं पानी में... ये एक तस्वीर उस अँधेरे की... चोट लगने के बाद तो धुंधली आँखों से ज्यादा कुछ दिखा नहीं... इंटरेस्ट भी जाता रहा... कुछ एक घंटे लग गए थे संयत होने में... फिर आगे बढ़ा सफ़र... रंग बिरंगे रस्तों पर... उसकी कहानी अगली बार...

1 टिप्पणियाँ:

Kapil Choudhary 14 सितंबर 2015 को 12:00 pm  

बहुत ही आकर्षक चित्रण और विवरण
धन्यवाद

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