अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जीवन बुनो... !!

ये
गर्मियों की शाम है...

लेकिन,

सुन्न है मन मस्तिष्क
वैसे ही
जैसी अनुभूति
बर्फ़ से घिरे होने पर होती है...


देखा है हमने
कई बार राहों में
"चेतना" खाली पाँव होती है... ...


फूल मुरझाने लगे हैं
पतझड़ करीब है...
मौसम का आना जाना एक बात है
एक स्थायी मौसम है जिसे कहते नसीब हैं...


जो लिख दिया नियति ने
वह तो होना ही है...
जीवन "पाना" जाने कितना है
हर क्षण तो ये बस "खोना" ही है... 


शायद,
सुन रहे हो तुम भी
कि हम तक भी तो आई ही है न
सन्नाटे को चीरती तुम्हारी आवाज़...


बूंदों ने जो गाया है
उस धुन में हैं जीवन के कई राज़...


सुनो...
मेरी बेतुकी बातें गुनो...

जीवन बुनो...!!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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