अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितने विम्ब, कितनी स्मृतियाँ: इस्ताम्बुल


ये झुण्ड... ये पंछियों की श्रृंखला आकर्षित करती है...! इनकी दुनिया कितनी भिन्न होती होगी न...! हम इंसानों की तरह न संग्रह की चिंता, न भविष्य की फिक्र... बस मन से जीना ... उस एक पल को... जो अभी है... जो उपस्थित है - ये सीखना चाहिए हमें इनसे...! हमें पंछियों से सीखनी चाहिए ये निर्लिप्तता... ये दाने चुगना... उड़ जाना... और बंधन मुक्त होते हुए भी बंधन युक्त  होना... लौट आना शाम को उसी धरा पर जहाँ से सुबह आकाश की राह ली थी... !!
इस्ताम्बुल में तोते की जोड़ी भी दिखी थी... पेड़ की चोटी पर...

तस्वीरों में कितने गगन...
कहाँ कहाँ से होकर लौटता है मन...
ये बहुत ऊँचाई पर थे... जाने क्या बातें करते होंगे यूँ सुस्ताते हुए... यही सब सोचते हुए, इन्हें क्लिक करने की कोशिश में गिरे भी थे... चोट भी लगी पर संभल गए... उत्साह ही ऐसा था... मन घर की ओर भाग रहा था और पाँव ज़मीन पर... !!

बिल्लियाँ भी कहीं से निकल आती थी... यूँ सड़कों पर सरपट दौड़ रही थीं कि इनसे बचने में भी हम दो चार बार तो गिरे ही... !
अब तक तो केवल गिरने पड़ने की बात हुई... खैर, जो लिखे... जैसा लिखे कलम... चोटें तो याद रह ही जाती हैं न... समय की गति सब ठीक भी करती है पर कुछ तो रह जाता है... उसी "याद" शहर की सूखी भूली बिसरी पत्तियों से हम रचते हैं जीवन... बीत गए समय का स्पंदन... मूक पेड़ों की भाषा और भी कितना कुछ... सब कुछ... कि अंततः हमारे पास बचता है क्या... बस यादें ही तो... ! ये यादें ही हैं जहाँ हम न होने के बाद मुस्कुराते हैं... किसी के स्मृति पटल पर... ! समय सब कुछ छीन लेता है... यादें छोड़ देता है हमारे लिए... कि जीने का कोई तो संबल हो... !!
विशाल वृक्ष की कितनी ही टहनियां, कितने ही पत्ते, कितना ही बीता वर्ष सब याद की शक्ल में ही तो दर्ज़ है पेड़ की स्मृतियों में... कुछ भी खोता कहाँ है... मिटता है तो केवल भ्रम... जो था जैसे था सब यथावत रहता है स्मृतियों में... सब कुछ लूटते हुए भी समय की श्रृंखला कुछ तो दे ही जाती है हम श्रीहीन इंसानों को... !!
ये इतना कुछ यूँ ही लिखते हुए बहुत कुछ रह गया है... तथ्य एवं इतिहास... वो अगली कड़ी में कभी...
अब जैसी भी है सुबह हो ही गयी है तो अन्य कार्य भी आवाज़ दे रहे हैं... चलें उस पल से निकल कर इस पल में... कि यही जीवन है... कल और आज के बीच सामंजस्य बिठाता... डोलता हुआ दो सिरों के बीच पेंडुलम सा... आंसू और हंसी के बीच की कितनी ही तस्वीरें उकेरता... कितने ही रहस्य खोलता... तठस्थ जीवन!

2 टिप्पणियाँ:

Preeta Vyas 11 सितंबर 2015 को 8:07 am  

कुछ भी खोता कहाँ है... मिटता है तो केवल भ्रम... जो था जैसे था सब यथावत रहता है स्मृतियों में... ....
wonderful right up

Kailash Sharma 11 सितंबर 2015 को 11:19 am  

ये यादें ही कुछ मुस्कानें ला देती हैं चहरे पर...बहुत प्रभावी लेखन

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ