अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मन... !!

क्या क्या
सोचते हैं हम...
क्या क्या
चाहता है मन...


कितने ही स्वप्न
ढह जाते हैं...
किस्से पूरे होते होते
रह जाते हैं...


अनगिन अनचीन्हे अवशेषों से दग्ध


खंडहर सा
हो जाता है मन...
कितने ही
रूप बदलता है जीवन...


कितने ही क्षण
मूक विकल अतिरंजित...
टेढ़ी-मेढ़ी राह में
कितनी ही संवेदनाएं रक्तरंजित... 


सभी विडम्बनाएं बिसार
फिर स्वप्न सजाता है...
मन हारते हारते
फिर जीत जाता है... 



निर्निमेष
निहारता है राहें...
तुम देखना कभी
इंतज़ार की निगाहें... 


एक निर्विकार चमक
रच बस जाती है...
डूबती हुई आस बार-बार हार-हार
पुनः सज जाती है...


और चलते रहते हैं
मौन ही मौन उपक्रम...
कैसे बदलेगा, अभी जो है,
जीवन का आचरण... 


कैसे
परिवर्तित होंगे आयाम...
कोई तो होगा थामे
उज्जवल सिद्धांतों की कमान... 


ऐसे ऐसे मन अपने भीतर
कैसी कैसी दुनिया बसाता है...
उमड़ता घुमड़ता हुआ, कई बार तो
सचमुच बादल हो जाता है...


बरस कर फिर
धूप भी वही बनता है...
मन की
अद्भुत क्षमता है... 


रे मन! दृढ़ता से चल अपनी राह, तभी बात बनेगी
ज़िन्दगी, कहाँ जाएगी, अगले मोड़ साथ हो लेगी... !!



2 टिप्पणियाँ:

ब्लॉ.ललित शर्मा 25 सितंबर 2015 को 10:56 am  

बहुत बढिया कविता अंतर्मन से उत्सर्जित, शुभकामनाएं। अब हम भी लौट आए हैं ब्लॉग पर, देखिए आज की पोस्ट

Onkar 25 सितंबर 2015 को 12:52 pm  

सुंदर प्रस्तुति

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ