हमेशा से अपनी रही होगी
तभी तो
इतनी जल्दी अपनी हो गयी,
एक स्मृति... एक चमक...
और फिर
सारी वेदना खो गयी
सुख दुःख की
परिभाषाएं
यहाँ भिन्न हैं,
अभिभूत था मन
कुछ इतना कि
आँख ख़ुशी-ख़ुशी रो गयी
हम कविता के
आँगन में
निकले जो,
सारा परिवेश हमारा हो आया
छंद की गरिमा
सारे कष्ट धो गयी
आओ यहाँ
देखो तो कौन है
जो लिखवा रहा है,
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
कुछ बिसरे पल
खिलखिलाते आंसू बनकर
हाथ थामने चले आये,
अब सवेरा होगा
जग जायेगी धूप
अंधियारी रात सो गयी
हमेशा से अपनी रही होगी
तभी तो
इतनी जल्दी अपनी हो गयी,
एक स्मृति... एक चमक...
और फिर
सारी वेदना खो गयी
कविता के आँगन में...!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
28 नवंबर 2011

39 टिप्पणियाँ:
बहुत खुशनुमा से एहसास बिखेरती हुई ....आज प्रसन्न हुए आपकी ये कविता पढ़कर ....!!
एक अलग दृष्टि देती सुन्दर रचना
हमेशा से अपनी रही होगी
तभी तो
इतनी जल्दी अपनी हो गयी,
एक स्मृति... एक चमक...
और फिर
सारी वेदना खो गयी
वाह ...बहुत ही बढि़या।
कुछ बिसरे पल
खिलखिलाते आंसू बनकर
हाथ थामने चले आये,
अब सवेरा होगा
जग जायेगी धूप
अंधियारी रात सो गयी
मन की पीड़ा सुनहरी यादें
मन की पीड़ा कम करती
चेहरे पर मुस्कान बिखेरती
सदा की तरह सुन्दर भाव ,
सुन्दर शब्द रचना
आज आपकी कविता ने हमारे मन के आँगन में भी खुशियाँ बिखेर दीं...
खूबसूरत एहसास के साथ शब्दों को पिरोया है|
आओ यहाँ
देखो तो कौन है
जो लिखवा रहा है,
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी
Bahut sundar....sach mein ghatit hi hoti hai kavitayein...adbhut
www.poeticprakash.com
बहुत सुंदर, क्या कहने
खुबशुरत अहसासो से संजोई लाजबाब प्रस्तुति बधाई ,,,
मेरे पोस्ट 'शब्द' में आपका इंतजार है,...
बधाई !
खूबसूरत अहसासों से भरी कविता ...
शुभकामनाएँ!
हम कविता के
आँगन में
निकले जो,
सारा परिवेश हमारा हो आया
छंद की गरिमा
सारे कष्ट धो गयी
sundar prastuti.
अपने कितना सही कहा है जो अपना होता है वह सदा भीतर रहता है और दुर्दिन में मित्र बन कर सुदिन में भी साथी बन कर साथ चला आता है... कभी कभी हम अपने में इतने खो जाते हैं कि उसे भुला देते हैं.. बहुत सुंदर कविता आशा भरी..
बेहतरीन
whoah this blog is fantastic i love reading your articles. Keep up the good work!
From everything is canvas
और धीरे से आँगन में मुट्ठी भर चांदनी बो गयी
अब् लहलहाएगी फसल चांदनी की
हो जायेगा सारा आलम दूधिया
खिल उठेगा तनमन चांदनी सा
धवल निर्मल निर्झर सा ,और
बह निकलेगी धरा कविताओं की
Very true . Poetry does have an amazing power to heal , apart from the wonderful creative satisfaction it provides . Only the poet knows that poetry is nothing but an extension of self. Hence हमेशा से अपनी रही होगी !! Beautiful !!
a sensible creation ,breaking myth untouched creativity..... thanks ji
कौन है जो लिख रहा है अक्षरों को
चाँद सितारों से धरा पर उतारकर,
इस लेखनी की चमक यूं ही बनी रहे
यहाँ चांदनी सदा शीतल बिखरती रहे ..
इस मधुर शीतलता के लिए अभिनन्दन ..
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी...
बहुत सुन्दर आदरणीया अनुपमा जी....
सुन्दर रचना के लिये सादर बधाई...
अपने ब्लॉग पर इस अच्छी कविता के जरिए मेरी उपस्थिति दर्ज करे।
:):):) और देखिये न कितनी खूबसूरत कविता बन पड़ी है..
बहुत अच्छा लगा!!
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
अद्भुत बिम्ब प्रयोग! कविता के भाव भी बहुत ही कोमल हैं।
sabhi panktiya dol ko chhoo lene wali hai...tarif
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी.... !
इतनी अच्छी कविता आप की
आपको सफल कवियत्री बना गई.... !!
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी
Wah...Bahut Sunder
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!यदि किसी ब्लॉग की कोई पोस्ट चर्चा मे ली गई होती है तो ब्लॉगव्यवस्थापक का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि वह उसकी सूचना सम्बन्धित ब्लॉग के स्वामी को दे दें!
अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! दिल को छू गई!
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com/
बेहद सुन्दर रचना भाव चित्र उकेरती सी जीवन का जगत का मानसिक कुन्हासा लिए हुए .ये एहसास गए तो ज़िन्दगी गई फिर क्या घर से दूर और क्या पास .एक एहसास ज़िंदा तो मैं ज़िंदा .दोनों रचनाएं बेहद की सुन्दर २५ और २८ नावंबरी .
कल 30/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है, थी - हूँ - रहूंगी ....
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
काव्य का ऐसा अनूठा रूप
मन भावन लगा ... वाह !
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
कुछ बिसरे पल
खिलखिलाते आंसू बनकर
हाथ थामने चले आये,
अब सवेरा होगा
जग जायेगी धूप
अंधियारी रात सो गयी
Pooree rachana behad sundar hai,par ye panktiyan man kee gahrayee me utar gayeen!
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ ।
सादर
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी.
.मनोभाव को बहुत ही खुबसूरत पँतियो में उतारा है..बहुत सुन्दर..
कविता जिसे घटित होती है - वह सौभाग्यशाली ही होते हैं | सबको नहीं घटित होती यह घटना |
चाँद सितारों से अक्षर
उतरे जो यूँ ही
कागज़ पर,
जाग उठी शाम निराली
और धीरे से धरती पर
मुट्ठी भर चाँदनी बो गयी
वाह! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !
आभार !
बेहतरीन अभिव्यक्ति |
आओ यहाँ
देखो तो कौन है
जो लिखवा रहा है,
मेरा तो बस ये सौभाग्य है
कविता आज
मेरे यहाँ घटित हो गयी....
..
मेरे साथ भी आज एक शुभ घटित हो गया ..आपको पता है अपने माधव न | दुनिया भर कि पुण्य आत्माओं को मेरे मेरे पास ला रहे हैं ...या यूँ कहों कि मुझे शिवम और सुन्दरम की ओर ले जा रहे हैं !!
कुछ ऐसे लोग होते हैं जो कविता के घर में यूँ ही कभी-कभार आ जाते हैं जैसे एक अच्छी शाम गुजारने, कुछ ऐसे होते हैं जो इस घर से बाहर नहीं आना चाहते, उनके आंगन में यूँ ही उतर जाती है कविता...आभार
KHOOBSURAT PRASTUTI............
आप की रचना बड़ी अच्छी लगी और दिल को छु गई
इतनी सुन्दर रचनाये मैं बड़ी देर से आया हु आपका ब्लॉग पे पहली बार आया हु तो अफ़सोस भी होता है की आपका ब्लॉग पहले क्यों नहीं मिला मुझे बस असे ही लिखते रहिये आपको बहुत बहुत शुभकामनाये
आप से निवेदन है की आप मेरे ब्लॉग का भी हिस्सा बने और अपने विचारो से अवगत करवाए
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.com/
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
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