अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

शायद... !!


शायद...

कभी-कभी
चले जाना श्रेयस्कर होता है 


कि लौट आने की सम्भावना सांस लेती रहे... 


कि जब लौटें
तो छूटा पड़ाव और सहज...
और ज़रा सुन्दर सा लगे...

सुख दुःख के
बिछड़े साथी सारे
हृदय से आ लगे... !


कभी-कभी
हम चुप हो जाते हैं...
इसलिए नहीं कि कहने को कुछ नहीं होता...


बल्कि शायद इसलिए...
कि जो यूँ ही नहीं हो रही है बात प्रेषित
वो कह देने पर भी समझी नहीं ही जाएगी...


मौन अगर अक्षम है
तो शब्द भी अनसुने ही रह जायेंगे...
इसके विपरीत तर्क-वितर्क की पूरी श्रृंखला के लिए
विकल्प खुल जायेंगे... 


इसलिए ही शायद
मौन बेहतर है...
समय वैसे भी समय आने पर
हर समस्या को लेता हर है... 


कि कुछ भी टिकता नहीं यहाँ-


न हमारे भ्रम...
न कटुताएं...
न दोस्तियाँ ही...


समय करवट लेता है
सब बदल जाता है 


कोई विरले ही ऐसा नाता है, जो हर मौसम मुस्काता है... !!

2 टिप्पणियाँ:

Onkar 26 सितंबर 2015 को 11:32 am  

बहुत सुंदर

Maheshwari kaneri 29 सितंबर 2015 को 9:07 am  

बहुत बढिया

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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