अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अंतराल!

जब शांत होती है वादियाँ
और मन बेचैन होता है
इच्छा होती है
किसी पुराने दोस्त से बात हो जाए

किसी पुराने दोस्त से बात होना
बात होना भर नहीं होता
बात करने से ज़्यादा
वह होता है
उन लम्हों को जीना-
जब सपनों से
ऊँची थी उड़ानें...
पल दर पल बाहों में होते थे
कितने ही तराने...
जब मोड़ से रस्तों के जुदा हो जाने की बात,
बेगानी थी!
आसपास जितने चेहरे थे,
सबसे पहचान पुरानी थी!

इच्छा होती है,
एक फ़ोन की दूरी पर जो बिंदु है
उससे सारी दूरियां क्षण में पाट ली जाए
इस अंतराल में जो कुछ घटा बीता है
सारी पीर बाँट ली जाए

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

25 टिप्पणियाँ:

Anita 25 फ़रवरी 2012 को 1:45 pm  

बहुत सुंदर जज्बात ! सच है कि पुराने वक्त को लाख चाहने पर भी फिर से जीया नहीं जा सकता...समय बढ़ता रहता है सब कुछ बदल जाता है...

यादें....ashok saluja . 25 फ़रवरी 2012 को 2:35 pm  

काश! कि सहज होता दुरी का मिट जाना
घड़ी की सुई का रुक जाना
बीते लम्हों का वापस
फिर से आ के मिल जाना ||
आप अपने बुजुर्गो के दिल में झांक के बात करती हैं ...
खुश और स्वस्थ रहें !
आशीर्वाद!

vidya 25 फ़रवरी 2012 को 2:49 pm  

बहुत सुन्दर ख़याल...
दिलों में दूरियां ना हो तो एक पुल सदा बना रहता है...जोड़े रहता है हमें...

ktheLeo 25 फ़रवरी 2012 को 2:54 pm  

दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

वाह! काश!

Travel Trade Service 25 फ़रवरी 2012 को 3:16 pm  

प्रकाश से भी तेज पुंज यादों का वलय बनजाता है ..मानो दूर से धुल उड़ाती किसी झुण्ड की तरह आती ..पर आखों में कई बार बरसते जल से ..उडी धुल धरा पर आ जाती है सब कुछ भीनी खुशबु के साथ ...फेल कर सिमटता चलता है ..उसके बाद वही ..ख्याल पुंह उस पल को पाने की चेष्टा ..वही एक क्षण जिसे यादों की दुनिया में जगह मिले...और अचानक संपर्क बिंदु ओझल !!! हम वही उसी जगह पर खुद को पातें है ...!!!!!!!सुंदर ख्याल को पिरोया है nirmal

sangita 25 फ़रवरी 2012 को 3:36 pm  

बहुत सुंदर जज्बात ! काश!
कि सहज होता दुरी का मिट जाना
घड़ी की सुई का रुक जाना
बीते लम्हों का वापस
फिर से आ के मिल जाना ||

Kailash Sharma 25 फ़रवरी 2012 को 4:21 pm  

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

....बहुत सुंदर..

रश्मि प्रभा... 25 फ़रवरी 2012 को 5:55 pm  

इच्छा होती है,
एक फ़ोन की दूरी पर जो बिंदु है
उससे सारी दूरियां क्षण में पाट ली जाए
इस अंतराल में जो कुछ घटा बीता है
सारी पीर बाँट ली जाए

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!... चाहने और होने में बहुत बड़ी खाई है

Dr.NISHA MAHARANA 25 फ़रवरी 2012 को 6:44 pm  

जब शांत होती है वादियाँ
और मन बेचैन होता है
इच्छा होती है
किसी पुराने दोस्त से बात हो जाएmere dil ki bat kh di ho jaise bahut achcha.

Pummy 25 फ़रवरी 2012 को 8:17 pm  

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!
नहीं...बिलकुल भी सहज नहीं होता....दूरियों का यूँ सिमट जाना...बहुत ही अच्छी कविता अनुपमा..

lokendra singh rajput 25 फ़रवरी 2012 को 8:44 pm  

पुराने दोस्त के पास यादों की एक मोटी किताब होती है। जब भी पुराने दोस्त से मुलाकात होती है या बात होती है लम्बी ही चलती है।

Atul Shrivastava 25 फ़रवरी 2012 को 8:58 pm  

बेहतरीन प्रस्‍तुति।
गहरी अभिव्‍यक्ति।

shashi purwar 26 फ़रवरी 2012 को 3:19 am  

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना! ............waah bahut khoob ...sunder prastuti . yeh satik varnan hai .badhai

mahendra verma 26 फ़रवरी 2012 को 7:02 am  

किसी पुराने दोस्त से बात होना
बात होना भर नहीं होता
बात करने से ज़्यादा
वह होता है
उन लम्हों को जीना-
जब सपनों से
ऊँची थी उड़ानें

बातों में उन लम्हों को जीना...
वाह, सुंदर भाव निरूपण..!

प्रवीण पाण्डेय 26 फ़रवरी 2012 को 9:32 am  

आया कोई याद हृदय में...

Onkar 26 फ़रवरी 2012 को 10:46 am  

behad sundar prastuti

ASHA BISHT 26 फ़रवरी 2012 को 11:00 am  

sundar

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 26 फ़रवरी 2012 को 12:34 pm  

सुन्दर रचना...
सादर.

Udan Tashtari 26 फ़रवरी 2012 को 1:40 pm  

वाकई दूरियों का सिमट जाना...इतना सहज कहाँ होता है...


सुन्दर भाव!!

shalini 26 फ़रवरी 2012 को 1:44 pm  

पुराने दोस्तों से मिलाने की इच्छा तो जब तब मन में सर उठती ही रहती है .....मन कि बात कह दी आपने ....बहुत खूब!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 26 फ़रवरी 2012 को 5:05 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

abhi 26 फ़रवरी 2012 को 5:34 pm  

:) :)

Sikta 27 फ़रवरी 2012 को 7:10 am  

loukik duriyan kahan paata ja sakta hai,aloukik najdikiyan se kahan fasla badh pata hai.sundar rachna anupama ji.

Sadhana Vaid 27 फ़रवरी 2012 को 6:43 pm  

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!

वाकई ! इतना सहज कहाँ होता है दूरियों का सिमट जाना ! ये दूरियां ही जीवन को कितने टुकड़ों में बाँट देती हैं ! बहुत मर्मस्पर्शी रचना ! आभार !

Mukesh Pandey 2 नवंबर 2013 को 5:36 am  

पर इतना सहज
कहाँ होता है?
दूरियों का सिमट जाना...
घड़ी की टिक टिक को रोक,
लम्हों का
आपस में लिपट जाना!
अपने बड़ी ईमानदारी से अपने भावों को स्प्ष्ट किया है..
सुन्दर रचना

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