बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने में,
ख़ुशी थोड़ी कम है...
सूखेपन से
जगह-जगह दरक गयी है धरती,
आँख कुछ नम है...
ऐसे में
बारिश की तस्वीर बना कर,
मन बस बहल जाता है...
कविता का अंतस
कोमलता लिखते हुए,
कई बार दहल जाता है...
अपने फूल से
बिछड़ी हुई कोई पंखुड़ी,
कुछ करुण सा गा देती है...
वहीँ से लेखनी
कोई तान चुन कर,
आपको सुना देती है...
हमारे सन्नाटों में
गूंजती है लगातार जो धुन,
मुखरित उसमे गम है...
बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने,
ख़ुशी थोड़ी कम है...!
ख़ुशी थोड़ी कम है...!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
14 मई 2012

30 टिप्पणियाँ:
बढियां भाव |
शुभकामनायें ||
कम ही सही....है तो..................
फिर क्या गम है!!!!!
:-)
खुशी और दर्द एक चक्र है जीवन के.. कभी ये ऊपर कभी वो.. मगर आपकी कविता में ढलकर तो ये और भी सुन्दर लगने लगते हैं!!
राही मनवा दुःख की चिंता क्यू सताती है , दुःख तो अपना साथी है :.)
''दो दिन की जिंदगी में ..
दुखड़े हैं बेशुमार ....
है ज़िंदगी उसी की जो -
हंस हंस के दे गुज़ार...
मरने के सौ बहाने ...
जीने को सिर्फ एक ...
उम्मीद के सुरों पे
बजाते हैं दिल के तार ....''
ऐसे में
बारिश की तस्वीर बना कर,
मन बस बहल जाता है........ कितना सुन्दर लिखा है आपने , बस खुशी एक मृगतृष्णा कि भांति मन को छलती रहती है .
उस कम ख़ुशी में बहुत सारे ग़म को भुलाने की अदभुत क्षमता होती है
हमारे सन्नाटों में
गूंजती है लगातार जो धुन,
मुखरित उसमे गम है...
बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने,
ख़ुशी थोड़ी कम है...!
कभी खुशी कभी गम यही तो जीवन यथार्थ है .///
MY RECENT POST ,...काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...
बहुत बढ़िया.....
दर्द तो अहसास है ,सह लेना सुखद है ,कह लेना दुखद ,पर जो बाँट लेता है ,वह हृदय से विषद है .... सुन्दर सृजन ,
जो भी खुशी है, उसे ही सजों ले हम..
बहुत सारा दर्द
बिखरा है ज़माने,
ख़ुशी थोड़ी कम है...!
पर खुशी को मायने भी तो यही दर्द देते हैं
bahot khoobsurat.....
कविता पढकर ऐसा लगा मानों मै खुद को इस कविता में जी रहा हॅू।
अतुलनीय । बधाई
कविता पढकर लगा मानों मैं स्वयं को ही जी रहा हॅू। अतुलनीय रचना के लिए बधाई।
तब तो खुशियाँ बिखेरना और बांटना और ज्यादा ज़रूरी हो जाता है ....क्यों है न अनुजी
सच तो ये है कि जिंदगी में दर्द और ख़ुशी का बेहरीन संतुलन है,
यह जरूर है कि दुख या दर्द का अहसास कुछ ज्यादा ही होता है।
अच्छी कविता।
खुशी को अपने दामन में भर लें।
bahut sundar abhivyakti .aabhar
आपके शब्द उन थोड़ी-सी खुशियों को amplify जो कर देते हैं, फिर कम कहाँ रह गयी! :)
बहुत सुन्दर! सहमत हूँ! मुझे लगता है कि प्रकृति में कण-प्रतिकण के संतुलन जैसे सुख-दुख का भी संतुलन है। जब क्षमाशील सहते हैं, हमें पता नहीं लगता परंतु जब कमज़ोर पर चोट लगती है तब कवि-हृदय पिघल जाता है।
हर घड़ी दिखा रही है रंग ज़िन्दगी
धूप है कभी, कभी है छाँव ज़िन्दगी
हर पल यहाँ जी भर जिओ
खुशियों के पल भरपूर जीना चाहिए...
क्योंकि यह कम मिलती हैं...
सुंदर प्रस्तुति
कभी खुशी कभी गम तो फिर आँख क्यों हो नम...अगर गम न हो तो खुशी को कोई पूछेगा ही नहीं...सुंदर कविता!
वाह क्या बात है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति
बहुत -बहुत सुन्दर रचना
सुन्दर प्रस्तुति:-)
बहुत सुंदर
क्या कहने
बहुत खूब ... क्या बात कह दी ....
जी हमें इसी थोड़ी ख़ुशी को संजो कर रक्जना है गम के लिए भी ....
बहुत सुंदर रचना .......
nice expression.....
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