अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नयन हमारे बरसाती हैं!

धड़कनों का संगीत
सुनाई दे जाए
ऐसी नीरव शांति है यहाँ
कुछ शब्द हैं, हैं कुछ विचार
जन्म ले रही हर पल
मन में क्रांति है यहाँ

मेरा मन युद्धक्षेत्र बना हुआ है
लड़ रही हैं
दो परस्पर विरोधी शक्तियां
भरने में लगे हुए हैं उन्हें, जो
जीवन हर क्षण
दे जाता है रिक्तियां

अपने आप से लड़ते हुए
कवितायेँ
लिखी जाती हैं...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

जहां बैठ धूप में
सुखा लेते अपने आंसू
वो आँगन ही नहीं है
जहां नाच उठती
संग संग कुछ प्राकृत बूंदें
वो प्रांगन ही नहीं है

अब तो बस एक ओट है
जहां से झाँक कर
सूरज रौशनी दे जाता है
जो रिश्ते कभी प्रकट नहीं होते
उन रिश्तों का आकाश
सदा मुस्काता है

कविता
एक सामानांतर रेखा की तरह
चलती है संग
उसकी सदाशयता
हर बार
करती है दंग

मेरे गगन पर
खिलने वाले इन्द्रधनुष को
यह कविताओं का रंग बड़ा भाता है
स्वयं सतरंगी है वह
पर बड़ी मासूमियत से
इनपे रिझा जाता है

शायद ये इन्द्रधनुष की ही चाहत है
जो हमसे
कविता लिखवाती है...
क्या करें हम?
बड़ी विडम्बना है
नयन हमारे बरसाती हैं!

10 टिप्पणियाँ:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 27 फ़रवरी 2012 को 11:31 am  

सच सच कहूँ ...आपकी कविता को पढ़ कर सही मायने मे कविता पढ्न सार्थक हो जाता है।

सादर

vidya 27 फ़रवरी 2012 को 11:33 am  

बहुत सुन्दर...
yashwant is right!!!!!

veerubhai 27 फ़रवरी 2012 को 1:23 pm  

अब तो बस एक ओट है
जहां से झाँक कर
सूरज रौशनी दे जाता है
जो रिश्ते कभी प्रकट नहीं होते
उन रिश्तों का आकाश
सदा मुस्काता है
अच्छी रचना है जीवन के यथार्थ को उघाडती सी .

RITU 27 फ़रवरी 2012 को 2:34 pm  

वाह बेहतरीन..
kalamdaan.blogspot.in

प्रवीण पाण्डेय 27 फ़रवरी 2012 को 3:08 pm  

युद्ध के निष्कर्ष तो अश्रुभरे होते हैं..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 27 फ़रवरी 2012 को 3:30 pm  

बरसने दीजिए इन बरसाती नयन को.. कुछ मन का बोझ हल्का होगा और कुछ अनूठी कविताओं का सृजन!! बेहद संवेदनशील!!

Mamta Bajpai 27 फ़रवरी 2012 को 3:33 pm  

सम्हाल कर रखिये इन बूंदों को इन्हें व्यर्थ यू जाया नहीं करते
ये तो अनमोल मोती है नाहक ही लुटाया नहीं करते
रचना लाजवाव है

udaya veer singh 27 फ़रवरी 2012 को 3:56 pm  

कविता और वरसात शायद ऐसी ही मनः स्थितियां है,जो एक दुसरे के बाद अवतरित हो ही जाती हैं ..... बहुत सुन्दर सृजन ../ मुबारका जी /

ASHA BISHT 27 फ़रवरी 2012 को 4:51 pm  

मेरे गगन पर
खिलने वाले इन्द्रधनुष को
यह कविताओं का रंग बड़ा भाता है
स्वयं सतरंगी है वह
पर बड़ी मासूमियत से
इनपे रिझा जाता है...waah

रश्मि प्रभा... 27 फ़रवरी 2012 को 4:59 pm  

मेरा मन युद्धक्षेत्र बना हुआ है
लड़ रही हैं
दो परस्पर विरोधी शक्तियां
भरने में लगे हुए हैं उन्हें, जो
जीवन हर क्षण
दे जाता है रिक्तियां... यह मन ही कुरुक्षेत्र बनता है , खुद से लड़ता है - खुद को भ्रम देता है, छल करता है, व्यूह बनाता है .... फिर जीतता है

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ