अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बस एक स्मरण!

शायद भूल गयी है
बात वो सारी...
जो चलना सीखते वक़्त
हम सबने सीखा था,
गिरते थे
फिर उठ कर
चलने का
हम सबमें सलीका था!

उस भोले-भाले उम्र में
न समझ थी,
न फ़लसफ़ों का ज्ञान था...
बस भोलापन था,
और शायद वही
सभी रटंत उक्तियों से महान था!

तभी तो,
बालपन में...
किसी के साथ नहीं घटित होता है
हतोत्साहित होना,
चलना नहीं आता है
सीखते हुए गिरते हैं
पर फिर पल में बिसर जाता है
छिले हुए घुटने के लिए रोना-धोना!

उठ कर नन्हें पग से
फिर ऊँगली थाम लेते हैं
कैसे नहीं होंगे पारंगत
बच्चे ये संकल्प ठान लेते हैं

फिर
यूँ ही गुज़रते हुए
समयचक्र
वो मासूमियत लील जाता है!
पढ़ता हुआ... बढ़ता हुआ
चलता हुआ... दौड़ता हुआ
एक रोज़ हारता है मन,
और भीतर से हिल जाता है!

निराशा के भंवर में फिर
राहें खो जाती हैं...
ज़िन्दगी फिर अचानक
सारे रंग त्याग स्याह हो जाती है...

तब बस एक स्मरण
उबारने को होता है हितकर
जानते हैं आप सभी... पर तब भी
हमसे फिर सुन लो, मित्रवर

एक भूली हुई बात बस
दुहरानी है कविता में
लिख जा रही है आज फिर
पर बात वही पुरानी है कविता में

आज भी सुख-दुःख की
ऊँगली थामे ही चलना है
गिरना है और
गिर कर पुनः संभालना है

सारा ज्ञान किनारे कर
बस चलना सीख रहे
एक बालक से
प्रेरणा लेनी है...
जीवन सतत संघर्ष है
जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

18 टिप्पणियाँ:

sushma 'आहुति' 26 फ़रवरी 2012 को 3:15 pm  

कुछ यादे जिन्हें जोड़ कर एक खुबसूरत रचना बन गयी......

Anupama Tripathi 26 फ़रवरी 2012 को 3:36 pm  

जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

bahut sunder ...

vidya 26 फ़रवरी 2012 को 3:39 pm  

आज भी सुख-दुःख की
ऊँगली थामे ही चलना है
गिरना है और
गिर कर पुनः संभालना है

प्रेरणाप्रद...
सुन्दर ..

रश्मि प्रभा... 26 फ़रवरी 2012 को 3:52 pm  

एक मूलमंत्र था सीखने का ... चोट लगती , भूल जाते ... तभी तो चेहरा खिला खिला सा होता था

Vibha Rani Shrivastava 26 फ़रवरी 2012 को 3:59 pm  

एक बालक से
प्रेरणा लेनी है...
जीवन सतत संघर्ष है
जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

सारे सवालों के जबाब या जिन्दगी के निचोड़ तो यही है..... !!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') 26 फ़रवरी 2012 को 4:09 pm  

जीवन का मर्म समझाती कविता। बधाई।

------
..की-बोर्ड वाली औरतें।

प्रवीण पाण्डेय 26 फ़रवरी 2012 को 4:58 pm  

बस हमको चलते जाना है..

abhi 26 फ़रवरी 2012 को 5:31 pm  

अच्छी अच्छी बातें :) :)

रजनीश तिवारी 26 फ़रवरी 2012 को 5:52 pm  

जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!
बहुत सुंदर प्रस्तुति ...

जयकृष्ण राय तुषार 26 फ़रवरी 2012 को 6:19 pm  

बहुत सुंदर कविता |

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 27 फ़रवरी 2012 को 3:33 am  

चलते चलें, कदम न रुकें...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 27 फ़रवरी 2012 को 7:12 am  

जिंदगी की राह पर चलना तो है ही ।

सादर

RITU 27 फ़रवरी 2012 को 7:40 am  

आज भी सुख-दुःख की
ऊँगली थामे ही चलना है
गिरना है और
गिर कर पुनः संभालना है
बहुत सुन्दर..
kalamdaan.blogspot.in

ktheLeo 27 फ़रवरी 2012 को 8:09 am  

जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!

वाह!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 27 फ़रवरी 2012 को 8:32 am  

गिरना और गिर कर उठना ॥और फिर अनवरत चलना ...यही हौसला है ॥ सुंदर भाव ॥

Asha Saxena 27 फ़रवरी 2012 को 11:39 am  

सुन्दर भावपूर्ण रचना और अच्छा शब्द चयन |
बधाई |
आशा

vasundhara pandey 27 फ़रवरी 2012 को 12:56 pm  

बहुत सुन्दर , बेहद भावपूर्ण ... !!

संगीता तोमर Sangeeta Tomar 27 फ़रवरी 2012 को 1:37 pm  

जीवन सतत संघर्ष है
जिंदगानी तो
संघर्ष, प्रण और हौसलों की ही
एक त्रिवेणी है!
सुंदर रचना.....

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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