न सफ़ेद होता है...
न स्याह होता है
बीच में कई रंग
घुले-मिले होते हैं चरित्र में,
इंसान झूलता रहता है
दो किनारों के मध्य
और आकार
उभरते जाते हैं चित्र में...
मानों,
सब परिस्थितियां ही
निर्धारित करती हैं,
कुछ भी अपने वश में नहीं
ये तथ्य
साधिकार प्रचारित करती हैं
होगा ये भी एक सच
पर एक तथ्य और है,
भले उतना प्रचारित नहीं
पर बात यही सिरमौर है...
कि,
स्याह या सफ़ेद होने का
विवेक है हमारे पास,
प्रभु प्रदत्त नेयमत यह
प्रणम्य है,
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
स्याह या सफ़ेद...?
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
30 मई 2012
13 टिप्पणियाँ:
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!बहुत सुन्दर भाव अनुपमा जी इंसान चाहे तो अपनी दृढ इच्छा शक्ति से अपनी परिस्थितियों का रुख मोड़ सकता है
सब परिस्थितियां ही
निर्धारित करती हैं,
कुछ भी अपने वश में नही,,,,,,,,,,
सुंदर प्रस्तुति,,,,,
RECENT POST ,,,,, काव्यान्जलि ,,,,, ऐ हवा महक ले आ,,,,,
बहुत बढ़िया....
बिलकुल सही..
सार्थक चिंतन
सादर
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
वाह ....
यही दृढ़ता नित नये आयाम तक पहुंचाती है ...!!
बहुत सुंदर रचना ....
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
मन के हारे हार है , मन के जीते जीत !
मध्यमार्गी पथ असाध्य है...
Bahut hi sateek aur sundar rachna Anupama. sadhuwaad !!
स्याह या सफ़ेद होने का
विवेक है हमारे पास,
प्रभु प्रदत्त नेयमत यह
प्रणम्य है,
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
जो स्याह या सफेद होने के भी पार चला गया वही मुक्त है...बहुत सुंदर कविता !
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
सच कहा आपने...
सार्थक रचना....
सादर।
बेहतरीन रचना
सादर
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!.....बहुत सही और सुन्दर प्रस्तुति..
अन्तःस्थिति की दृढ़ता के समक्ष
परिस्थितिजन्य बाधाएं
नगण्य हैं!
यह दृढता ही तो नही होती जिससे सब कुछ गड्डमड्ड होकर सलेटी हो जाता है ।
सुंदर प्रेरक रचना ।
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