अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मन का एकाकी कोना!

रात में सूरज..., हाँ ऐसा ही होता है यहाँ; कुछ रात दस बजे के आसपास सूर्य की रौशनी से जगमग दृश्य... ऐसी ही होती है स्टॉकहोम में गर्मियों की शामें... जब तक आँख लगती है रात ग्यारह बारह के आसपास तब तक तो रौशनी रहती ही है और जब भी कभी करवट बदले और आँख खुल जाए तीन या फिर चार बजे, तब भी रौशनी होती ही है... जाने कब अन्धकार होता है और कब गायब हो जाता है, पता भी नहीं चलता! आसमान बड़ा सुन्दर लगता है खुली खिड़की से... एक कैनवास सा, जहां कितने ही आकार उकेर रखे हों प्रभु ने...



कहाँ सोचा था कभी
इतनी दूर भी कभी आना होगा
रहना होगा यहाँ
जाननी समझनी होगी यहाँ की भाषा
और महसूसने होंगे यहाँ के मौसम


यहाँ होता है खूब रौशनी से भरा ग्रीष्म
होती है खूब अँधेरी सर्दी की रातें


रौशनी का अतिरेक कभी
और कभी अँधेरे का सर्व व्यापक होना
ताल मेल बिठाते-बिठाते
विस्मृत हो जाता है मन का एकाकी कोना


मन के उस कोने में
भर जाती है धूप
बहुत अँधेरा आने वाला है
विगत वर्षों में अनुभूत हो चुका है वह स्वरुप


इसलिए
कल के लिए ज़रूरी है,
आँखों में ही सही
आज कुछ रौशनी बसाई जाए!
आज
अनुकूल मौसम में,
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

22 टिप्पणियाँ:

abhi 29 जून 2012 को 3:05 am  

यहाँ होता है खूब रौशनी से भरा ग्रीष्म
होती है खूब अँधेरी सर्दी की रातें

अब हम स्टॉकहोम आयें तब तो अनुभव करें इसका ;)

Dr.NISHA MAHARANA 29 जून 2012 को 3:26 am  

sahi bat hai ....kal ko sunhara banane ke liye....

Anupama Tripathi 29 जून 2012 को 3:32 am  

sundar ...sarthak ...sakaratmak ...abhivyakti ...
shubhkamnayen ....

M VERMA 29 जून 2012 को 3:56 am  

कल के लिए ज़रूरी है,
आँखों में ही सही
आज कुछ रौशनी बसाई जाए!

आँखों की रोशनी से रोशन जहाँ होगा
बहुत सुन्दर रचना

डॉ॰ मोनिका शर्मा 29 जून 2012 को 5:10 am  

देश के बाहर आने के बाद से कुछ ऐसा ही महसूस किया है ......

dheerendra 29 जून 2012 को 7:08 am  

अनुकूल मौसम में,
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,सुंदर रचना,,,,,

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

रश्मि प्रभा... 29 जून 2012 को 8:45 am  

रौशनी का अतिरेक कभी
और कभी अँधेरे का सर्व व्यापक होना
ताल मेल बिठाते-बिठाते
विस्मृत हो जाता है मन का एकाकी कोना.... फिर अचानक सब याद आता है और लगता है .... कहाँ सोचा था कि ऐसा भी होगा

mahendra verma 29 जून 2012 को 9:32 am  

आज
अनुकूल मौसम में
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

देश भी नया, मौसम भी नया !
स्वाअनुभूति को सुंदर शब्द दिए हैं आपने।

यादें....ashok saluja . 29 जून 2012 को 9:43 am  

किसे पता !जिन्दगी क्या रंग दिखाए
कहाँ बचपन बीते ,कहाँ जवानी बिताएं!
खुश रहो !
शुभकामनाएँ!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 29 जून 2012 को 11:58 am  

बेहतरीन


सादर

rafat 29 जून 2012 को 12:19 pm  

ताल मेल बिठाते-बिठाते
विस्मृत हो जाता है मन का एकाकी कोना
मन के उस कोने में
भर जाती है धूप
बहुत अँधेरा आने वाला है
विगत वर्षों में अनुभूत हो चुका है वह स्वरुप
इसलिए
कल के लिए ज़रूरी है,
आँखों में ही सही
आज कुछ रौशनी बसाई जाए..ji chahta hai puri kwita nakl karoon ..bahut badhiya dil mein utrti rachna..tesri koshish hai teesre triqs se comment post karne ki dekhiye kyaa ho.shukriya

सदा 29 जून 2012 को 1:01 pm  

वाह ... अनुपम भाव ...

अनुपमा पाठक 29 जून 2012 को 1:05 pm  

धन्यवाद, Rafat सर!
पता नहीं क्यूँ टिपण्णी पोस्ट करने में समस्या हुई:(
कुछ technical problem रही होगी!

@All, Thanks for all the kind words!

Saras 29 जून 2012 को 1:42 pm  

इसलिए
कल के लिए ज़रूरी है,
आँखों में ही सही
आज कुछ रौशनी बसाई जाए!
आज
अनुकूल मौसम में,
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

बहुत सुन्दर भाव ......!

Maheshwari kaneri 29 जून 2012 को 3:05 pm  

अनुकूल मौसम में,
कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!!

बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,सुंदर रचना,,,,,आभार अनुपमा जी..

Arvind Mishra 29 जून 2012 को 3:29 pm  

इन दिनों स्टाकहोम का प्रवास चल रहा है ?
शुभ हो -बाह्यांतर का द्वंद्व झेलता कवि मन ! :)

Arvind Jangid 29 जून 2012 को 3:43 pm  

कल के लिए
कुछ कलियाँ उगाई जाए!! बहुत सुन्दर !

Onkar 29 जून 2012 को 5:18 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

expression 30 जून 2012 को 10:06 am  

प्यारी...
बहुत प्यारी रचना....

प्रवीण पाण्डेय 30 जून 2012 को 4:24 pm  

कुछ पल अपने में, बस एकान्त..

संतोष त्रिवेदी 3 जुलाई 2012 को 12:57 pm  

परदेस में रहकर अपनी ज़मीं व आसमान और याद आते हैं,दिन-रात व मौसम ऐसे ही तडपाते हैं !

Bhagirath Kankani 31 अगस्त 2012 को 5:51 am  

sundar rachanaa.

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!