होता है ऐसा भी...
जीवन के समानांतर चलता रहता है,
कुछ मौत के जैसा भी-
मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!
जबकि सच्चाई यह होती है-
उत्साह वैसे ही रहा होता है अपना
जैसे सम्बद्ध है साँसों से जीवन,
मुक्तहस्त लुटाई गयीं होती हैं खुशियाँ
फूलों से होता है भरा हुआ
खिला खिला उपवन!
फिर,
क्या अकारण ही छाती है निराशा?
चिंतित मन को क्या हो दिलासा?
इस मनःस्थिति से
कैसे हो मुक्ति?
शायद,
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!
वो
मिल जाए बस,
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
एक मात्र कवच!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
12 जुलाई 2012

25 टिप्पणियाँ:
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
......जिंदगी की बातें बिल्कुल सही हैं।
यथार्थवादी कविता।
आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)
आत्मविश्वास से बढ़कर निराशा और चिंता का कोई दूसरा इलाज़ नहीं...
सारी व्याधियों और परेशानियों का हल मन में ही छुपा होता है...
मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!
मैं भी कोई युक्ति ढूँढने का प्रयास कर रही हूँ :)
तमिस्रमय जीवन पथ पर , तम हरती एक लघु किरण भी
डगमग में गति भर देते विश्वास ह्रदय का अणु भर भी
इस मनःस्थिति से
कैसे हो मुक्ति?
शायद,
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!..
सचमुच ,..
अनुपमा जी .
.बस पहचानना है
त्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच! ---- बेशक
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
बिल्कुल सच कहा ... बेहतरीन प्रस्तुति।
निराशा के बाद मिली आशा का स्वाद भी तो बदल जाता है..मन का यह ढंग ही है वह परिवर्तन चाहता है...कभी खुशी कभी गम..मन के पार ही एक सा मौसम है ..
this shall pass too.....
यही दिलासा है...
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
...यकीनन !!!!!!!!!!!!!!!
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच..asal baat yahi hai
सभी व्याधियों के विरुद्ध-एक मात्र कवच! आत्मविश्वास...
सचमुच....
सुंदर रचना...
सादर
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!
सहज ..सुंदर और सार्थक रचना ....!!
सही कहा. आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
अनुपमा जी, बहुत अच्छा संदेश दिया है आपने अपनी कविता में।
आत्मविश्वास ही सदा हमें बचाये रखता है..
VERY NICE.
बहुत ही सुंदर
"मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!...."
अक्सर ऐसा ही लगता है।
आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
हमेशा की तरह सुन्दर भाव लिए रचना ..बधाई !!!
पहले आत्मविश्वास से बुराई पर जीत होती थी
आज बुराई जीतने से आत्मविश्वास बढता है ...:-))
mar mar ke jiyo ya je bhar ke ke jiyo ,yeh karana aur chunana hamara kaam!maut aur jindagi ek hi sikke ke do pahlu hai!!
प्रथम समय यहाँ आया, अच्छा लगा।
www.yuvaam.blogspot.com
एक टिप्पणी भेजें