एक मात्र कवच!

होता है ऐसा भी...
जीवन के समानांतर चलता रहता है,
कुछ मौत के जैसा भी-

मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!

जबकि सच्चाई यह होती है-
उत्साह वैसे ही रहा होता है अपना
जैसे सम्बद्ध है साँसों से जीवन,
मुक्तहस्त लुटाई गयीं होती हैं खुशियाँ
फूलों से होता है भरा हुआ
खिला खिला उपवन!

फिर,
क्या अकारण ही छाती है निराशा?
चिंतित मन को क्या हो दिलासा?

इस मनःस्थिति से
कैसे हो मुक्ति?
शायद,
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!

वो
मिल जाए बस,

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!

25 टिप्पणियाँ:

संजय भास्‍कर 12 जुलाई 2012 को 3:31 pm बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
......जिंदगी की बातें बिल्कुल सही हैं।
यथार्थवादी कविता।

संजय भास्‍कर 12 जुलाई 2012 को 3:32 pm बजे  

आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

संध्या शर्मा 12 जुलाई 2012 को 7:26 pm बजे  

आत्मविश्वास से बढ़कर निराशा और चिंता का कोई दूसरा इलाज़ नहीं...

लोकेन्द्र सिंह 12 जुलाई 2012 को 7:52 pm बजे  

सारी व्याधियों और परेशानियों का हल मन में ही छुपा होता है...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 12 जुलाई 2012 को 8:16 pm बजे  

मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!

मैं भी कोई युक्ति ढूँढने का प्रयास कर रही हूँ :)

ashish 13 जुलाई 2012 को 4:46 am बजे  

तमिस्रमय जीवन पथ पर , तम हरती एक लघु किरण भी
डगमग में गति भर देते विश्वास ह्रदय का अणु भर भी

RITU BANSAL 13 जुलाई 2012 को 5:28 am बजे  

इस मनःस्थिति से
कैसे हो मुक्ति?
शायद,
मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!..

सचमुच ,..
अनुपमा जी .
.बस पहचानना है

रश्मि प्रभा... 13 जुलाई 2012 को 8:23 am बजे  

त्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच! ---- बेशक

सदा 13 जुलाई 2012 को 9:11 am बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
बिल्‍कुल सच कहा ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

Anita 13 जुलाई 2012 को 11:03 am बजे  

निराशा के बाद मिली आशा का स्वाद भी तो बदल जाता है..मन का यह ढंग ही है वह परिवर्तन चाहता है...कभी खुशी कभी गम..मन के पार ही एक सा मौसम है ..

ANULATA RAJ NAIR 13 जुलाई 2012 को 1:30 pm बजे  

this shall pass too.....
यही दिलासा है...

Saras 13 जुलाई 2012 को 3:28 pm बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!
...यकीनन !!!!!!!!!!!!!!!

rafat 13 जुलाई 2012 को 4:37 pm बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच..asal baat yahi hai

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 13 जुलाई 2012 को 6:11 pm बजे  

सभी व्याधियों के विरुद्ध-एक मात्र कवच! आत्मविश्वास...
सचमुच....
सुंदर रचना...
सादर

Anupama Tripathi 14 जुलाई 2012 को 4:04 am बजे  

मन के भीतर ही है कहीं
छिपी हुई युक्ति!

सहज ..सुंदर और सार्थक रचना ....!!

Onkar 14 जुलाई 2012 को 9:19 am बजे  

सही कहा. आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है

महेन्‍द्र वर्मा 14 जुलाई 2012 को 11:07 am बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!

अनुपमा जी, बहुत अच्छा संदेश दिया है आपने अपनी कविता में।

प्रवीण पाण्डेय 14 जुलाई 2012 को 11:10 am बजे  

आत्मविश्वास ही सदा हमें बचाये रखता है..

subhash 15 जुलाई 2012 को 10:29 am बजे  

VERY NICE.

VIJAY KUMAR VERMA 15 जुलाई 2012 को 10:39 am बजे  

बहुत ही सुंदर

Bhawna Kukreti 17 जुलाई 2012 को 7:18 am बजे  

"मन में घर कर जाती है
उदासीनता,
उत्साह का इस कदर लोप हो चुका होता है...
मानों वह कभी रहा ही न हो
अस्तित्व का अंश!...."
अक्सर ऐसा ही लगता है।

Unknown 17 जुलाई 2012 को 12:12 pm बजे  

आत्मविश्वास ही हो सकता है
सभी व्याधियों के विरुद्ध-
एक मात्र कवच!

हमेशा की तरह सुन्दर भाव लिए रचना ..बधाई !!!

अशोक सलूजा 17 जुलाई 2012 को 7:44 pm बजे  

पहले आत्मविश्वास से बुराई पर जीत होती थी
आज बुराई जीतने से आत्मविश्वास बढता है ...:-))

Ideal thinker 18 जुलाई 2012 को 5:40 am बजे  

mar mar ke jiyo ya je bhar ke ke jiyo ,yeh karana aur chunana hamara kaam!maut aur jindagi ek hi sikke ke do pahlu hai!!

गुरप्रीत सिंह 4 दिसंबर 2012 को 10:22 am बजे  

प्रथम समय यहाँ आया, अच्छा लगा।
www.yuvaam.blogspot.com

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