जो हुआ अवतरित
हरापन...
कब क्यूँ कैसे?
घोषित हो गया मरा!
धुरी पे घूमते हुए
विचारमग्न,
कुछ कुछ चिंतित
हो उठी धरा!
हम पर ही
आस लगाये हुए है,
कातर नयनों से
एकटक ताक रही है...
वो सहनशील धरणी
माँ है हमारी
हमारे मन के भीतर
झाँक रही है...
क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
मरहम भी बन कर आएगा
कोई पूण्य संकल्प...
शत-प्रतिशत
आशान्वित है धरा!
आशान्वित है धरा!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
22 अप्रैल 2012

18 टिप्पणियाँ:
जहाँ चाह वहाँ राह .हम भी आशावान है
वो सहनशील धरणी
माँ है हमारी
हमारे मन के भीतर
झाँक रही है
सचमुच, धरती मां कितना कुछ सहती है !!
वो सहनशील धरणी
माँ है हमारी
हमारे मन के भीतर
झाँक रही है
सचमुच, धरती मां कितना कुछ सहती है !!
क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
मरहम भी बन कर आएगा
कोई पूण्य संकल्प...
शत-प्रतिशत
आशान्वित है धरा!
सुंदर प्रस्तुति, !
MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...:गजल...
बेहतरीन भाव, कथ्य ,शब्द चयन संजीदा सृजन बधाईयाँ जी /
बढ़िया रचना!
पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएँ!
हम भी कब से आस लगाये बैठे हैं,
जिसके हाथों डोर, वही बस ऐंठे हैं।
अभिलाषा के आँचल में , भंडार तृप्ति का भर दो........
बढ़िया प्रस्तुति ।
बधाई अनुपमा जी ।।
बहुत सुन्दर वाह!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 23-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-851 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ
आखिर वह मां है, आश्न्वित तो रहेगी ही, कि आज न कल उसके लाल सुधरेंगे।
its earth day............
mother earth is crying!!!!
"credit" goes to we all ruthless human beings.......
nice post anupama.
anu
क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
धारा की आशा पूर्ण हों ... अच्छी प्रस्तुति
बहुत ही बेहतरीन रचना अनुपमा जी ! हमारा भी कर्तव्य बनता है हम अपनी माँ को निराश ना करें ! अर्थ दिवस पर बहुत प्रेरक प्रस्तुति ! बधाई आपको !
क्षीण संकल्पों के दौर में भी
नहीं उदासीन वह,
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
धरती के दर्द को अब नहीं समझा तो असहनीय क्षति हो चुकी होगी.
हरापन भले नहीं आँचल में
पर घाव तो है न हरा!
सच! एक पुण्य-संकल्प ही तो होनी चाहिए.. हम सभी में..
मरहम भी बन कर आएगा
कोई पूण्य संकल्प...
शत-प्रतिशत
आशान्वित है धरा!
बहुत हि बढिया
हमारे ही तो दिए हुए घाव हैं जो वह निरंतर सह रही है .....और हमी पर आशाएं भी टिकी हैं...शायद हम वक़्त रहते चेत जायें और उसे मिटने से बचा लें
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