अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अस्तित्व का भान!

मेरी कवितायेँ शीर्षक विहीन हुआ करती थीं... यूँ ही लिखते थे और कोई शीर्षक नहीं ढूंढ़ पाते थे... किसी शीर्षक की परिधि में भाव को बाँधने का अनुशाषण सीखना मेरे शब्दों के लिए सरल नहीं रहा है... एक बार एक शीर्षक मिला था नाता उसपर लिखी थी कविता... पहले भी यहाँ उसके विषय में लिख चुके हैं... एक और शीर्षक मिला था अलविदा उस पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं, अब इधर जब 'अस्तित्व' पर लिखने की बात आई तो 'नाता' और 'अलविदा' कविता याद हो आये... विश्वास नहीं था कि कुछ लिख पाएंगे क्यूंकि मेरे लिए लिखना बस ऐसे ही होता है बिना सोचे समझे.... अब ये मीता जी की प्रेरणा ही रही कि एक सुबह यह कविता 'अस्तित्व का भान' अस्तित्व में आ गयी! धन्यवाद चिरंतन, अपने अंक में मेरी कविता को स्थान देने के लिए...

झूठी इस दुनिया में
सत्य का अस्तित्व कहाँ है?
ये तलाशने को भटके मन
खामोश ताके ऊपर से नील गगन

सुबह से रात हो गयी
उलझनें कितनी साथ हो गयीं
फिर चाँद का मन पिघल गया
वह तुरंत बादलों से निकल गया

साथ चलते हुए कहता रहा
संग संग मानसिक हलचलों को झेलता रहा
अस्तित्व के प्रश्न पर मौन हो गया
एक रौशनी खिली और भटकाव सारा गौण हो गया

कहने लगा चाँद-

अंधकार का अस्तित्व है जबतक
रौशनी की पूजा है तबतक
झूठ जब तक हर मोड़ पर खड़ा है
सत्य वहीँ जीतने के लिए अड़ा है

मृत्यु जब तक मुस्कुरा रही है
जीवन की कलियाँ तब तक खिलखिला रही हैं
उदासी का आलम है जबतक
खुशियों का अस्तित्व है वहीँ कहीं तबतक

कोई अकेला नहीं आया है
प्रभु ने सबको जोड़ों में बनाया है
बारी बारी से सब हमारे जीवन में आते हैं
अस्तित्व में आता है जीवन तो मौत को भी हम एक दिन अपनाते हैं

अब देखो न, मेरी चांदनी का अस्तित्व सूरज से है
उधार की रौशनी से चमकता हूँ
लेकिन दिवस भर जो नहीं कर पाया सूरज
उसी की रौशनी से उसका ही काम करता हूँ-
दर्द तुम्हारे हरता हूँ
नीरव रात्रि में बातें तुमसे करता हूँ
तर्क सारे रखकर मौन हो जाता हूँ
यहाँ बात मेरी नहीं तुम्हारी है, मैं गौण हो जाता हूँ

अस्तित्व का प्रश्न है
तो मन ही मन गुनता हूँ
धड़कनें तेरे हृदय की
साफ़ साफ़ सुनता हूँ

सुन! ध्यान धर
और इस बात का सम्मान कर
कि तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है
जीवन झूठा नहीं वह सत्य का संधान है
अंतिम छोर पर मृत्यु की गोद है
जीवन की इन टेढ़ी मेढ़ी राहों पर ही कहीं मुक्ति का बोध है

चल, कि उसे तलाशना है तुझे
अपने 'अस्तित्व का भान' तराशना है तुझे
इतना कहते ही खिल उठा चाँद का मन
आ गए थे दिनमान अब खामोश नहीं था गगन!

32 टिप्पणियाँ:

Meeta 21 मार्च 2012 को 11:03 am  

तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है
जीवन झूठा नहीं वह सत्य का संधान है
अंतिम छोर पर मृत्यु की गोद है
जीवन की इन टेढ़ी मेढ़ी राहों पर ही कहीं मुक्ति का बोध है ... sundar bhav .

प्रवीण पाण्डेय 21 मार्च 2012 को 11:04 am  

सबको अपने अस्तित्व का भान हो तो सूरज मुस्करा उठेगा।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 21 मार्च 2012 को 12:09 pm  

बेहतरीन रचना

सादर

expression 21 मार्च 2012 को 12:28 pm  

दर्द तुम्हारे हरता हूँ
नीरव रात्रि में बातें तुमसे करता हूँ
तर्क सारे रखकर मौन हो जाता हूँ
यहाँ बात मेरी नहीं तुम्हारी है, मैं गौण हो जाता हूँ

बहुत सुन्दर!!!!

ashish 21 मार्च 2012 को 12:31 pm  

हम भी ढूंढ़ रहे है . अद्भुत .

shalini 21 मार्च 2012 को 1:35 pm  

कोई अकेला नहीं आया है
प्रभु ने सबको जोड़ों में बनाया है
बारी बारी से सब हमारे जीवन में आते हैं
अस्तित्व में आता है जीवन तो मौत को भी हम एक दिन अपनाते हैं
...... एक बहुत ही सुन्दर बात कितने सरल शब्दों में कह डी आपने ...बहुत खूब!

Rajesh Kumari 21 मार्च 2012 को 1:40 pm  

bahut sundar addbhut rachna.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 21 मार्च 2012 को 1:56 pm  

सब ही सब से हैं जुड़े, रहे सदा ये मेल
ऐसे ही अस्तित्व का, सृष्टी करती खेल

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 21 मार्च 2012 को 2:34 pm  

सुन्दर कविता.. रोचक परिचय!!

रश्मि प्रभा... 21 मार्च 2012 को 3:27 pm  

झूठी इस दुनिया में
सत्य का अस्तित्व कहाँ है?
ये तलाशने को भटके मन
खामोश ताके ऊपर से नील गगन... होता तो उसीका अस्तित्व है , भ्रमित परदे झूठ के लदे होते हैं

मनोज कुमार 21 मार्च 2012 को 6:43 pm  

एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन। बधाई।

यादें....ashok saluja . 22 मार्च 2012 को 11:21 am  

सत्य के 'अस्तित्व' से र-ब-रु कराती काप की रचना!
बधाई!

भावना 23 मार्च 2012 को 10:50 am  

"...तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है"...
असल में यही तो अस्तित्व का भान है :)

Kailash Sharma 23 मार्च 2012 को 11:03 am  

कि तेरा अस्तित्व ही प्रमाण है
जीवन झूठा नहीं वह सत्य का संधान है
अंतिम छोर पर मृत्यु की गोद है
जीवन की इन टेढ़ी मेढ़ी राहों पर ही कहीं मुक्ति का बोध है

.....अस्तित्व को तलासती गहन भावपूर्ण प्रस्तुति..

Onkar 24 मार्च 2012 को 1:15 pm  

sundar panktiyan

mahendra verma 25 मार्च 2012 को 6:37 am  

अंधकार का अस्तित्व है जबतक
रौशनी की पूजा है तबतक
झूठ जब तक हर मोड़ पर खड़ा है
सत्य वहीँ जीतने के लिए अड़ा है

कविता हो तो ऐसी हो,
बहुत सुंदर।

lokendra singh rajput 25 मार्च 2012 को 12:43 pm  

खूबसूरत कविता।

veerubhai 26 मार्च 2012 को 12:05 pm  

सुबह से रात हो गयी
उलझनें कितनी साथ हो गयीं
फिर चाँद का मन पिघल गया
वह तुरंत बादलों से निकल गया
बहुत सुन्दर बिम्ब है पूरी कविता में एक अनतर धारा है अन्दर करेंट है जिसका निर्वाह आखिर तक हुआ है .

veerubhai 26 मार्च 2012 को 12:08 pm  

अंतर/अंडर पढ़ें कृपया .

रचना दीक्षित 26 मार्च 2012 को 6:10 pm  

"उदासी का आलम है जबतक
खुशियों का अस्तित्व है वहीँ कहीं तबतक"

दुःख के बाद सुख आने पर उसकी असली कीमत पता चलती है.

सुंदर अंतर्द्वन्द प्रस्तुत किया अनुपमा जी.

खूबसूरत प्रस्तुति.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 27 मार्च 2012 को 4:16 am  

चल, कि उसे तलाशना है तुझे
अपने 'अस्तित्व का भान' तराशना है तुझे
इतना कहते ही खिल उठा चाँद का मन
आ गए थे दिनमान अब खामोश नहीं था गगन!

सार्थक रचना.....

Coral 28 मार्च 2012 को 3:55 am  

अस्तित्व का प्रश्न है
तो मन ही मन गुनता हूँ
धड़कनें तेरे हृदय की
साफ़ साफ़ सुनता हूँ
खूबसूरत !

amrendra "amar" 28 मार्च 2012 को 7:32 am  

खूबसूरत प्रस्तुति.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 29 मार्च 2012 को 8:02 am  

कल 30/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Trupti Indraneel 30 मार्च 2012 को 5:57 am  

अस्तित्व का प्रश्न है
तो मन ही मन गुनता हूँ
धड़कनें तेरे हृदय की
साफ़ साफ़ सुनता हूँ

बहुत सुन्दर !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 30 मार्च 2012 को 7:23 am  

सबके अपने अपने अस्तित्व हैं ...सुंदर प्रस्तुति

Maheshwari kaneri 30 मार्च 2012 को 7:25 am  

सार्थक रचना..खुबसूरत प्रस्तुति..

Saras 30 मार्च 2012 को 9:39 am  

बहुत ही सुन्दर कविता अनुजी ..एक एक भाव मोती के समान जड़ा है ......

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) 30 मार्च 2012 को 9:59 am  

अपना अस्तित्व तलाशने कभी ज़िंदगी निकल जाती है.. सार्थक रचना. !!

abhi 9 अप्रैल 2012 को 5:43 am  

देखिये आपके दिए सभी लिंक को पढ़ा मैंने, और "नाता की यात्रा" बहुत पसंद आई...थोड़ा थोड़ा नॉस्टैल्जिक सा भी अनुभव कर रहा था पढ़ते समय...हालांकि जो कुछ थोड़ा सा याद आया वो कहीं से भी आपकी उस पोस्ट से जुड़ा हुआ नहीं था, लेकिन फिर भी होता है न कभी कभी...कुछ पढके कुछ चीज़ें याद आ जाती है...एनीवे, मैं इस पोस्ट के बजाय आपके उस पोस्ट की बातें करने लगा...शीर्षक लिखना मेरे लिए भी हमेशा कठिन होता है..और शीर्षक को ध्यान में रख कर कुछ भी लिखना तो और भी कठिन...कविता आपकी तो हमेशा ही पसंद आती है, और ये कविता भी सच में बेहद खूबसूरत है..

anjana 9 अप्रैल 2012 को 3:16 pm  

nice....

Mukesh Pandey 29 अक्तूबर 2013 को 5:58 am  

कोई अकेला नहीं आया है
प्रभु ने सबको जोड़ों में बनाया है
बारी बारी से सब हमारे जीवन में आते हैं
अस्तित्व में आता है जीवन तो मौत को भी हम एक दिन अपनाते हैं

अद्भुत लेखन।। :)

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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