उनके पास गीत है
वे गाते हैं...,
पंछी
सारा आकाश
नाप आते हैं
हमारे पास
मुट्ठी भर दाने हैं,
वही...
बस वही हम
लुटाते हैं
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
उनके पास गीत है...!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
27 अप्रैल 2012

36 टिप्पणियाँ:
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....
कोमल भाव की सार्थक रचना एक मौन सन्देश देती सी .
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
कृपया यहाँ भी पधारें -
रक्त तांत्रिक गांधिक आकर्षण है यह ,मामूली नशा नहीं
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
आरोग्य की खिड़की
आरोग्य की खिड़की
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_992.html
ये पंछी हमें लुभाते हैं जीवन राग दे जाते हैं
अपने बन्धनों में बाँधना चाहते हैं हम आसमान के परिन्दों को।
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
....लाज़वाब पंक्तियाँ....बहुत सुंदर
nirmal prastuti.
चलो गायें हम भी पंछियों के संग............
चुरा लें उनके गीत......
...और हमारा जीवन संगीत से भर जाते हैं .....
बहुत खूब ....मोती चुनने की कला किसी किसी को आती हैं
वाह ....बहुत खूब ...
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
वाह बहुत सुंदर
चलो ना , उनके सुर में सुर मिला हम भी गाते हैं :)
बहुत सुंदर प्रस्तुति,लाजबाब पंक्तियाँ,...
अनुपमा जी,...आपकी रचना पसंद आई,..आभार
MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....
बहुत सुन्दर भाव ।
बधाई ।
सादर ,
खुले विचारों वाला जीवन, चाहत उनकी थोड़ी ।
मुक्त गगन उन्मुक्त उड़ाने, गाये गीत निगोड़ी ।
चौबिस घंटे परबस रविकर, मुट्ठी भर ले दाने-
चाहे जीवन-सार सीखना, पर चिड़िया ना माने ।।
हमारे पास
मुट्ठी भर दाने हैं,
वही...
बस वही हम
लुटाते हैं
जो जिसके पास हो वही लुटाए...लुटाने का भाव ही तो मुख्य है, पंछी गीत लुटाते हैं, फूल खुशबू और आप शब्दों की यह धारा...
हमारे पास
मुट्ठी भर दाने हैं,
वही...
बस वही हम
लुटाते हैं
Excellent expression and vocabulary... took me to the sky for a fluttering flight...
Keep writing...
अच्छा भावान्वेषण । पर्रिदोँ के आसमान की धरती इन्सानोँ से कुछ इस तरह जुदा है। आदमी सीख कर भी सीख नहीँ पाता, पंछी बिन सीखे सीख दे जाता है।
बेहद खूबसूरत और गहन अभिव्यक्ति
वाह ...अनुपम भाव संयोजित करती पंक्तियां ।
वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
"इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं"
बहुत ही सुंदर !
सुँदर गीत .
गीत गाते गाते आसमान नाप जाते हैं ....हकीकत है ....
बहुत सुंदर रचना ....
काश ! हम भी आजाद पंछी बन पाते |
आपकी यह कविता मुझे बहुत सशक्त लगी। कोई शाब्दिक लफ़्फ़ाज़ी नहीं, बस सीधे-सरल शब्दों में गम्भीर बात।
बहुत बढ़िया...
बेहद खूबसूरत भाव
इससे पहले कि
ख़ाली हथेलियाँ हमारी शर्मिंदा हों,
चुग कर कुछ मोती...
झट से
वे उड़ जाते हैं
उनके पास गीत है
वे गाते हैं....
आप अपने भावों को बहुत सरलता और सुंदरता से प्रस्तुत कर देती है यही आपकी सबसे बड़ी खूबी है. बधाई.
पंछियों के गीत हमें प्रेरणा देते हैं।
अच्छी कविता।
Bahut sundar:-)
behad khubsoorati say likha hai apne
सच है! सारी बाते भली हैं .....
शुभकामनाएँ!
Bahut sundar bhav hain, Bahut Bahut Badhaai
:):):) waah..kitni khoobsurat kavita likhi hai aapne!!!
वाह:बहुत सुन्दर प्रस्तुति....अनुपमाजी..
रूनझुन सी सरगम ... :)
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