अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

क्यूँ लिखते हैं हम...?

अपना ही मन पढ़ने के लिए
लिखते हैं हम...
खुद को समझने के लिए!

जब फिसल जाती है सकल रेत मुट्ठी से...
तब भी
कुछ एक रज कणों को
अपना कहने के लिए,
लिखते हैं हम...
दो सांसों के बीच का अंतराल जीने के लिए!

जब-जब मिलता है बाहें फैलाये जीवन...
तब-तब
उसके हर अंश को समेट
वापस आसपास बिखरा देने के लिए,
लिखते हैं हम...
खाद से ख़ुशबू लेकर लुटा देने के लिए!

जब भी होता है आसमान उदास...
तब उसमें
अपनी कल्पना से
अनगिन बादल बना देने के लिए,
लिखते हैं हम...
हवाओं का आँचल सोंधी महक से भींगा देने के लिए!

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

19 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 18 मई 2012 को 11:52 am  

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

मन की बात लिख दी ....!!
लेखन मन का दर्पण ही है ...!!
सुंदर रचना ...अनुपमा जी ...!!

रश्मि प्रभा... 18 मई 2012 को 1:09 pm  

खुद को पढ़ने के लिए ही हम लिखते हैं ....

रविकर फैजाबादी 18 मई 2012 को 1:12 pm  

बढ़िया प्रश्न-
सटीक उत्तर |

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 18 मई 2012 को 1:53 pm  

"लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए! "

बिलकुल सही कहा आपने।

सादर

Aparna Bhagwat. 18 मई 2012 को 2:58 pm  

सच, खुदको तौलने का कोई बेहतर दूसरा तरीका भी नहीं।

प्रवीण पाण्डेय 18 मई 2012 को 3:57 pm  

अपना दर्द अपने लिये ही सहेज कर रखते हैं हम..

M VERMA 18 मई 2012 को 4:02 pm  

लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!
और फिर खुद के भीतर झांकना आसान तो नहीं है
बहुत सुन्दर रचना

dheerendra 18 मई 2012 को 4:12 pm  

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

अपने मन के अंदर झाकने के लिए लिखने से अच्छा कोई दूसरा तरीका नही,.......
बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति

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MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....

udaya veer singh 18 मई 2012 को 5:11 pm  

लाज़वाब... उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..आभार

sushma 'आहुति' 18 मई 2012 को 5:35 pm  

बहुत सुंदर मन के भाव ...

मनोज कुमार 18 मई 2012 को 7:16 pm  

जब हम अपने भीतर झांकने के लिए लिखते हैं तो वह एक आध्यात्मिक कृति बन जाती है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 18 मई 2012 को 8:43 pm  

सटीक लिखा है ...

Onkar 19 मई 2012 को 12:44 pm  

behad sundar

संध्या शर्मा 19 मई 2012 को 8:48 pm  

हाँ लिखते हैं ताकि चुपचाप लिखती कलम के बोलते शब्दों में खुद को तलाश सकें ... बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Madhuresh 19 मई 2012 को 9:55 pm  

अपने ही भीतर झांकने के लिए!
इसी उम्मीद में कि कभी ये शब्द अंतरात्मा को छूएं.. और हम अपनी सारी emotions वहीँ के वहीं, तभी के तभी उड़ेल सकें..
सुन्दर!
सादर,
मधुरेश

lokendra singh rajput 19 मई 2012 को 10:52 pm  

अनुपमा जी शानदार प्रस्तुति...

Prady 24 मई 2012 को 5:32 pm  

बस युं ही समझो भावना कह लेने को लिख लेते हैं,
रजकणों के अवशेषों की रेख पर मुर्तरूप कर लेते हैं,
तुम शब्दों में बाँधना जीवन के विस्तारों को,
अपना एक कोना हम भी, भिंच कर सहेज लेते हैं,
उदास आसमानों पर बाद्लों की कल्पना,
भीगी हवा के सोंधेपन से गमकती अल्पना,
भावना की स्याही से रचे हर्फों को तुम जब भी पढना,
स्मृतियों के पटल पर उजास छवि सी बन दमकना, तुम हे अनुपमा |

.............( प्रदीप यादव) 24 मई,2012
आपकी रचना पर मेरा साधुवाद स्वीकार्य हो महोदया....

Reena Maurya 21 जून 2012 को 12:43 pm  

बहुत ही सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति..
अति उत्तम...
:-)

निहार रंजन 23 दिसंबर 2012 को 3:50 am  

चुप सी कलम की स्याही जांचने के लिए
लिखते हैं हम...
अपने ही भीतर झांकने के लिए!

सुन्दर अभिव्यक्ति. सुन्दर रचना.

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