अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बर्फ़ीली बारिश को देखते हुए...!

आज मौसम ही ऐसा है, अभी अभी सूरज देवता झांके खिड़की से... उन्हें प्रणाम किया और कुछ कार्य में व्यस्त हो गए... तीन दिन की छुट्टी के बाद आज पुनः वही भागदौड़ वाली दिनचर्या... इसी सब में उलझे थे कि देखा बर्फ़ गिर रही है... इतनी जल्दी कहीं बदलता है आसमान का परिदृश्य... सूर्य देव गायब और हर तरफ उजला उजला... फिर वही बर्फ़ की चादर ओढ़े धरा!
मन का मौसम भी तो ऐसा ही होता है न... पल पल बदलता हुआ; ये कविता बस यूँ ही मन के मौसम से बाहरी वातावरण को जोड़ती हुई...

चले जाने के बाद लौट आया है
बर्फ़ के गिरते फाहों की शक्ल में
आसमान का रुदन

हो जाएगा
कुछ ही क्षणों में श्वेत
धरा का आँगन

मानों अपने आँचल में उसके सारे आंसू समेट
उसी एक रंग में रंगकर
निभा रही हो धरा कोई नेह भरा बंधन

मन कल्पना करने को स्वतंत्र है
लेकिन कोई और रूपक नहीं मिलता हमें इस बर्फ़ीली बारिश के लिए
इसे बस कह दे रहे हैं हम धरा-गगन का सम्मिलित क्रंदन

सूरज झाँका था सुबह सवेरे
हमारे मंत्रोच्चार के साथ ही लौट गया दबे क़दमों से
उसे शायद पता था आज आसमान का है रोने का मन

अब सभी ओर सफ़ेद ही सफ़ेद है
गिरते बर्फीले लफ्ज़ भी और तनहा ज़मीन भी
लालिमा से युक्त नहीं है अभी नभ फूल या चमन

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन

खिली खिली सी लगे चांदनी
दिख पाए अपनी समग्रता में सूरज की किरणें
वो दृष्टि दे जाता है रूदन!

27 टिप्पणियाँ:

expression 20 मार्च 2012 को 7:42 am  

बहुत सुन्दर....
शायद सच कहा.. आँसू सफ़ेद होते होंगे...अपने में सात रंग लिए....कभी गुजारुंगी उन्हें मन के प्रिज़्म में से...

dheerendra 20 मार्च 2012 को 8:13 am  

अब सभी ओर सफ़ेद ही सफ़ेद है
गिरते बर्फीले लफ्ज़ भी और तनहा ज़मीन भी
लालिमा से युक्त नहीं है अभी नभ फूल या चमन
बहुत सुंदर

my resent post

काव्यान्जलि ...: अभिनन्दन पत्र............ ५० वीं पोस्ट.

महेन्द्र श्रीवास्तव 20 मार्च 2012 को 9:17 am  

क्या बात है,
बहुत सुंदर

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन

Aparna Bhagwat. 20 मार्च 2012 को 9:23 am  

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे, रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर

The tears - Transparent, but with the strength salt within. Be it a joyous moment or something to grieve for...they remain the same in nature - always.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 20 मार्च 2012 को 9:30 am  

सुंदर प्रस्तुति ...

भावना 20 मार्च 2012 को 9:33 am  

मन का मौसम ..बहुत सुन्दर

kamal bhai 20 मार्च 2012 को 10:09 am  

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन-
जीती रहो, ऐसे बेदाग़ भाव, सीधी सच्ची अभिव्यक्ति इस दौर में कम ही देखने को मिलती है... तुम्हारा अंतर्मन भी हो न हो ऐसा ही साफ़-शफ्फाक है..हमें शब्दों के माध्यम से ऐसे ही उस मन से मिलाते रहो..

अरुण चन्द्र रॉय 20 मार्च 2012 को 10:17 am  

bahut sundar kavita... dil ko chhu gai

Kailash Sharma 20 मार्च 2012 को 10:51 am  

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन

...बहुत खूब! बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना...

veerubhai 20 मार्च 2012 को 10:57 am  

सूरज झाँका था सुबह सवेरे
हमारे मंत्रोच्चार के साथ ही लौट गया दबे क़दमों से
उसे शायद पता था आज आसमान का है रोने का मन
सुन्दर विचार सरणी .उदास मन का कुदरत से तारतम्य .जो अन्दर है वह बाहर है .

सदा 20 मार्च 2012 को 11:10 am  

बहुत ही बढि़या ...

संध्या शर्मा 20 मार्च 2012 को 12:13 pm  

ये आंसू हो न हो श्वेत ही होते होंगे
रंग से न भले ही पर स्वभाव से तो ज़रूर
निभा लेते है अकेले ही सातों रंगों का वचन...
Awesome...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 20 मार्च 2012 को 12:18 pm  

सुन्दर रचना....
सादर.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 20 मार्च 2012 को 1:17 pm  

बहुत ही अच्छा और मर्मस्पर्शी शब्दचित्र!


सादर

वन्दना 20 मार्च 2012 को 1:55 pm  

इसे बस कह दे रहे हैं हम धरा-गगन का सम्मिलित क्रंदन…………आह ! शायद यही सच है।

G.N.SHAW 20 मार्च 2012 को 2:37 pm  

कल्पना के पल भी अजीब से होते है ! बहुत सुन्दर

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" 20 मार्च 2012 को 2:37 pm  

सफ़ेद आंसू भी सात रंगों का मिलन है

sangita 20 मार्च 2012 को 3:52 pm  

.बहुत सुन्दर

रविकर 20 मार्च 2012 को 4:06 pm  

बढ़िया प्रस्तुति |
बधाई स्वीकारें ||

मनोज कुमार 20 मार्च 2012 को 4:43 pm  

प्रकृति के बिम्ब के माध्यम से आपने मानव मन के उमड़ते भावों को जो शब्द दिए हैं वह शब्द चित्र बहुत ही रोचक बन पड़ा है।

रश्मि प्रभा... 20 मार्च 2012 को 5:48 pm  

मन के मौसम से बाहरी वातावरण तक बहुत कुछ मिला

प्रवीण पाण्डेय 21 मार्च 2012 को 3:42 am  

आँसू का रंग स्याह से श्वेत हो जाता है, अन्दर से बाहर आते आते।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 21 मार्च 2012 को 5:54 am  

एक सर्वथा नवीन उपमा से सजी अनूठी कविता!!

ashish 21 मार्च 2012 को 6:53 am  

सुँदर परिकल्पना को खूबसूरत शब्द मिले है . अतुलनीय .

dheerendra 21 मार्च 2012 को 4:33 pm  

बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सटीक रचना,......

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काव्यान्जलि ...: अभिनन्दन पत्र............ ५० वीं पोस्ट.

दिनेश पारीक 23 मार्च 2012 को 5:17 am  

बहुत बहुत धन्यवाद् की आप मेरे ब्लॉग पे पधारे और अपने विचारो से अवगत करवाया बस इसी तरह आते रहिये इस से मुझे उर्जा मिलती रहती है और अपनी कुछ गलतियों का बी पता चलता रहता है
दिनेश पारीक
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abhi 9 अप्रैल 2012 को 5:49 am  

हमें भी जाने का मन है ऐसे मौसम में!! :)

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