अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक अकेले छिद्र पर टिकी आस!

मन में निरंतर चल रही एक प्रार्थना के कुछ अंश यूँ लिख गए... सो बस सहेज ले रहे हैं यहाँ...!

एक छेद भर रौशनी भीतर आती रहे
और ढूंढ़ ले खोया हुआ उत्साह

वो
उत्साह
जो चूक गया है
बीतते उम्र के साथ शायद कहीं दुबक गया है

बहुत देर तक यूँ दुबका रहा तो
हो जाएगा विनष्ट
और फिर नहीं उग पायेगा विश्वास
कभी भी...,
एक ज़रा से उत्साह के अभाव में

अँधेरी
बंद कोठरी के
एक अकेले छिद्र पर ही मेरी आस टिकी है;
प्रविष्ट करे रौशनी
और खोज निकाले खो चुके उत्साह को

पाए जाने के तुरंत बाद
धूल झाड़कर
खड़ी हो जाए उमंग

झूमे मन
और फिर से शुरू हो जीवन...!

18 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 25 मई 2012 को 1:29 pm  

जिन खोजत तिन मुतियन मांग भरावत .....!!!!
आस जागी रहे ....शुभकामनायें....अनुपमा जी ...!!

sushma 'आहुति' 25 मई 2012 को 3:20 pm  

बहुत प्रेरक और सुंदर अभिव्यक्ति..

बेनामी 25 मई 2012 को 3:54 pm  

Very touching and meaningful. Says lot in limited words. God bless. Pramod Saigal

expression 25 मई 2012 को 3:55 pm  

एक छेद से भी जो रौशनी भीतर आते है उसमें भी सात रंग होते हैं............
इन्द्रधनुष बन के रहेगा....
:-)

dheerendra 25 मई 2012 को 4:05 pm  

बहुत सुंदर प्रेरक अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,,,,,

MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

Kailash Sharma 25 मई 2012 को 5:10 pm  

रोशनी की एक किरण ही काफ़ी है ज़िंदगी के लिये...बहुत सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति...

anju(anu) choudhary 25 मई 2012 को 6:18 pm  

नई उमंग ..और रोशनी के साथ जीवन ऐसे ही आगे बढता रहे ...

shalini 25 मई 2012 को 6:40 pm  

आस की एक क्षीण सी किरण पर ही हमारा विश्वास टिका रहता है..... बहुत सुन्दर प्रार्थना!

Maheshwari kaneri 25 मई 2012 को 7:37 pm  

मन को छूने वाली सार्थक रचना....

यादें....ashok saluja . 26 मई 2012 को 8:02 am  

ये लड़ाई है ..नन्हे दीये और तूफ़ान की ....
शुभकामनाएँ!

प्रवीण पाण्डेय 26 मई 2012 को 8:25 am  

आज का दिन और यह क्षण, बस यही प्रारम्भ है..

ashish 26 मई 2012 को 9:12 am  

तमसो माँ ज्योतिर्गमय . जीवन में उमंग तारी रहे . सुँदर .

Anita 26 मई 2012 को 10:32 am  

उत्साह कभी खत्म होता नहीं, होता सा लगता है..वह सदा है और उसका ही उपहार है विश्वास..सुंदर रचना !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 26 मई 2012 को 5:35 pm  

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

Madhuresh 26 मई 2012 को 8:18 pm  

वही थोड़ी-सी रौशनी जीवंत कर जाएगी सबकुछ... विश्वास हो तो बस इतना ही काफी है...!!
सुन्दर, दिल को छूती हुई रचना..
सादर
मधुरेश

प्रेम सरोवर 28 मई 2012 को 3:33 am  

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Rajput 29 मई 2012 को 3:04 am  

संभव नहीं और शायद ज़रूरी भी नहीं कि
जीवन को हमेशा
पकड़ा ही जाए,
अच्छा है...
बस कुछ पल सुस्ताना छाँव में
फिर चल देना...!


इसलिए किसी ने कहा है 'जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबह-शाम'
बहुत खूब

abhi 1 जून 2012 को 4:56 am  

badi achhi achhi kavitaayen likhi hain aapne in dino...ye kavita bhi inspire karti hai...
bahut khoobsurat!! :)

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