अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हर युग के प्रारब्ध में...!

जब तक रहते हैं हम तब तक इमारत सांस लेती है और त्यक्त होते ही मानों इमारत का भी जीवन समाप्त होने लगता है... और विरानगी समाते समाते धीरे धीरे वह बन जाता है खंडहर!
हर युग की यही कहानी है, हर इमारत ढ़हती है..., यादों के महल भी समय के साथ खंडहर बन जाते हैं..., हमारा शरीर भी तो एक रोज़ कभी बुलंद रही छवि का अवशेष मात्र ही रह जाता है...!
चिरंतन के लिए कविता लिखनी थी..., विषय था खंडहर; इस पर सोचते हुए मन बहुत विचलित हुआ, सन्नाटों को सुनने के प्रयास में लिख गयी कविता आज यहाँ भी सहेज लेते हैं...!
अपने सुन्दर अंक में सारगर्भित रचनाओं के बीच मेरे प्रयास को भी स्थान देने के लिए चिरंतन का आभार!


ऊंची अट्टालिकाओं की भीड़ में
ले रहे हैं सांस,
ख़ामोश खंडहर...

अपनी ख़ामोशी में,
सहेजे हुए
वक़्त की कितनी ही करवटें
कितने ही भूले बिसरे किस्से
बीत चुके
कितने ही पहर...

सन्नाटे में गूंजती
किसी सदी की हंसी
जीर्ण-शीर्ण प्राचीरों के
मौन में फंसी,
इस सदी के द्वार पर
दे दस्तक
दिखलाती है-
वक़्त कैसे अपने स्वभाव के अधीन हो
ढ़ाता है कहर...

हमेशा ये अट्टालिकाएं भी नहीं रहेंगी
निर्विकार, निर्विघ्न चल रही है प्रतिक्षण
परिवर्तन की लहर...

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!

25 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 27 जून 2012 को 11:25 am  

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!

कितना सही लिखा है आपने ...!!हम आगे जब चलते हैं ...कुछ ना कुछ तो पीछे छूटता ही है ...!!

सदा 27 जून 2012 को 11:30 am  

सार्थकता लिए सशक्‍त लेखन ... आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) 27 जून 2012 को 11:53 am  

बहुत सशक्त कविता

Kailash Sharma 27 जून 2012 को 12:04 pm  

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!

.....एक गहन और शाश्वत सत्य की सशक्त और सटीक अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 27 जून 2012 को 12:31 pm  

हमेशा ये अट्टालिकाएं भी नहीं रहेंगी
निर्विकार, निर्विघ्न चल रही है प्रतिक्षण
परिवर्तन की लहर...

बेहतरीन पंक्तियाँ

सादर

Arvind Jangid 27 जून 2012 को 12:39 pm  

बहुत ही शसक्त और विषय प्रधान ! बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 27 जून 2012 को 1:15 pm  

सशक्त और सार्थक प्रस्तुति!

वन्दना 27 जून 2012 को 1:38 pm  

बेहद गहन अभिव्यक्ति।

M VERMA 27 जून 2012 को 2:34 pm  

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!

सशक्त और अत्यंत प्रभावशाली

रविकर फैजाबादी 27 जून 2012 को 2:36 pm  

उत्कृष्ट ||
शब्दों की शानदार इमारत ||
भावों का स्थाई बसेरा |

ashish 27 जून 2012 को 4:17 pm  

प्रारब्ध तो खंडहर होना है हर ईमारत को . सटीक अभिव्यक्ति

यादें....ashok saluja . 27 जून 2012 को 4:44 pm  

इमारत बुलंद थी ....इसी का सबूत है खंडहर ..?
इसी सच को तो जानना है ........
शुभकामनाएँ!

अजय कुमार झा 27 जून 2012 को 5:16 pm  

आपकी पोस्ट पढी ,मन को भाई ,हमने चर्चाई , आकर देख न सकें आप , हाय इत्ते तो नहीं है हरज़ाई , इसी टीप को क्लिकिये और पहुंचिए आज के बुलेटिन पन्ने पर

rafat 27 जून 2012 को 5:53 pm  

baat aapne solaah takaa sahi farmaai aur khandahron ke ghrepan se gharaai lekar..aabhar

Anju (Anu) Chaudhary 27 जून 2012 को 6:21 pm  

बहुत खूब

प्रवीण पाण्डेय 27 जून 2012 को 6:39 pm  

युग ढहते हैं और साथ में ढहते हैं उसके प्रतीक..

dheerendra 27 जून 2012 को 6:45 pm  

हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!,,,,,
बहुत खूब भाव पूर्ण पंक्तियाँ,,,,,

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

Shanti Garg 27 जून 2012 को 6:52 pm  

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 27 जून 2012 को 7:47 pm  

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 28 -06-2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में .... चलो न - भटकें लफंगे कूचों में , लुच्ची गलियों के चौक देखें.. .

Rakesh Kumar 28 जून 2012 को 3:37 am  

संसार हर क्षण हर पल संसरण कर रहा है
कहीं कुछ नया बन रहा है तो
कहीं कुछ खंडहर हो रहा है

सुन्दर गहन अभिव्यक्ति.

Point 28 जून 2012 को 5:13 am  

बहुत सशक्त....लिखा हुआ

Anita 28 जून 2012 को 8:43 am  

अनुपमा जी, सही शब्द इमारत होना चाहिए, जिसकी नींव गहरी होगी वही इमारत ज्यादा दिन टिकेगी...पर सदा के लिये तो नहीं..

Saras 28 जून 2012 को 1:56 pm  

एक सिहरन सी दौड़ गयी ....आपकी रचना पढ़कर .......बहुत ही सशक्त और सारगर्भित रचना

अनुपमा पाठक 28 जून 2012 को 4:36 pm  

सही शब्द बताने के लिए आभार, Anita जी:)
सभी मित्रों का आभार!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 3 जुलाई 2012 को 2:47 am  

संत कबीर के शब्द "साँझ पड़े भुई लोटना ..." याद आ गये

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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