ये दुनिया ही ऐसी है
संवेदनशील हों अगर आप
तो कभी
सुखी नहीं रह सकते...
एक दर्द रिसता रहता है भीतर
एक ज्वाला में जलता रहता है मन
एक ऐसी पीर
जो आप किसी से कह नहीं सकते!
अगर प्रवृति जान ली अपनी
तो इसी में चतुर्दिक भलाई है
कि इस दर्द से
यारी कर ली जाए...
नहीं तो समस्यायों का विकराल रूप
सुरसा सम मुख खोले रहेगा
इसलिए,
आनंद ढूंढ़ कर पीड़ा में मन मोद मनाए!
किसी के पास उजाला नहीं है,
देना है तो देने के नाम
हर मोड़ पे लोग
केवल विशुद्ध तम ही देते हैं...
ख़ुशी का लबादा ओढ़े लोग
घुट रहे हैं भीतर भीतर,
क्या दे ऐसे अभाव में किसी को?
देते हैं तो केवल गम ही देते हैं!
मन मेरे!
छोड़ ये जग के फेरे
ये सदियों से ऐसा ही है
न बदला है, न बदलेगा...
आंसू तेरे अपने हैं, नीर बहा ले
और इस दोस्ती पे मान कर-
कभी नहीं पथरायेंगी तेरी आँखें
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा!
पीड़ा में मन मोद मनाए!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
27 फ़रवरी 2012

17 टिप्पणियाँ:
अपना तो शौक है ,दर्द जगाने का
फिर पीढा में मन मोद मनाने का ||
आभार!
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा!.....sau baaton ki ek baat....very good Anupama..
बिलकुल सच कहा....
संवेदनशीलता खुद के लिए बड़ी भारी पड़ती है....
मगर क्या किया जाये...
सुन्दर भाव अनुपमा जी..
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......
इस उम्दा रचना को पढ़वाने के लिए आभार!
दूसरे अध्धाय में जब कृष्ण कहते हैं कि 'सुख-दुखे समे कृत्वा' तो ये थोड़े ही है कि पत्थर बन जाओ... ये है कि ऐसे बनो कि दुःख में भी ख़ुशी महसूस हो!
संवेदनाएं ही तो 'वास्तविक' और सार्थक जीवन का सार है!
सादर
जीवन का सार लिए विचार ... बहुत सुंदर
बहुत सुन्दर कविता |
शानदार!!
यह कविता एक प्रकार से निराशावादिता के विरुद्ध आशावादिता का प्रचार है।
जाने कितने घाव लगे हैं,
कितना खून बहा भावों का..
बढिया भाव है रचना के।
एक दर्द रिसता रहता है भीतर
एक ज्वाला में जलता रहता है मन
एक ऐसी पीर
जो आप किसी से कह नहीं सकते!... बिल्कुल
मन मेरे!
छोड़ ये जग के फेरे
ये सदियों से ऐसा ही है
न बदला है, न बदलेगा...
आंसू तेरे अपने हैं, नीर बहा ले
और इस दोस्ती पे मान कर-
कभी नहीं पथरायेंगी तेरी आँखें
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा!
.....जीवन का सत्य बहुत सुंदरता से अभिव्यक्त किया है...
आंसू तेरे अपने हैं, नीर बहा ले
और इस दोस्ती पे मान कर-
कभी नहीं पथरायेंगी तेरी आँखें
हर दुःख में ये आंसू तेरे संग बहेगा! ....सुन्दर प्रभावपूर्ण प्रस्तुति अनुपमाजी!
सुन्दर भाव सुन्दर प्रभावपूर्ण अनुपमा जी..
sunder samvedansheel rachna ...
एक टिप्पणी भेजें