अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

क्षितिज के पार!

हम करते हैं मानवीयकरण प्रकृति का
और कहलवाते हैं
किसी पंछी या फिर कल-कल बहती नदिया से
अपनी वेदना...
अपनी संवेदना

क्या कभी सोचा है हमने?
हमारे मन की वाणी बन कर
क्या सोचता होगा उनका मन
हमारी कथा बांच कर कैसा लगता होगा उन्हें...
क्या होता होगा कोई स्पंदन

जब धरती और अम्बर के क्षितिज पर मिलने के भ्रम को
अपनी अपनी तरह से व्याख्यायित करते हैं हम
तो क्या नहीं मुस्कुराते होंगे धरा और गगन
कि, देखो तो-
कितना सयाना है... हमारे बहाने अपनी बात कहता है
कवि कहाँ-कहाँ क्या-क्या टटोलता रहता है!

क्या पता तब हाथों में हाथ डाले
उसी क्षितिज पर धरती अम्बर टहलते हों
बांटते हो अपने-अपने किस्से और फिर
अपनी-अपनी राह निकलते हों

कौन जाने...
चाँद तारों से पटा अम्बर
हममें तारों की टिमटिमाहट और तेज ढूंढ़ता हो...
और जब देख लेता हो
हमारे आपके रूप में टंके अनगिन ध्रुवतारे धरती पर
तो भावविभोर हो हर्षातिरेक में आँखें अपनी मूंदता हो...

क्या पता
धरती अम्बर फिर आपस में बतियाते हों
अपने आँचल में टंके ध्रुवतारों से गर्वान्वित हो
धरती के सारे घाव बिसर जाते हों

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

अब भी देखो,
धरती गगन के बहाने अपना ही मन गा रही है
हममें आपमें सांस ले रही महान संभावनाओं के प्रति
लेखनी श्रद्धानत हुई जा रही है
और इस दृश्य में शामिल नेपथ्य में खड़ी कविता
बस मंद मंद मुस्कुरा रही है!

35 टिप्पणियाँ:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 13 अप्रैल 2012 को 5:06 pm  

बहुत ही खूबसूरत।


सादर

dheerendra 13 अप्रैल 2012 को 5:06 pm  

अब भी देखो,
धरती गगन के बहाने अपना ही मन गा रही है
हममें आपमें सांस ले रही महान संभावनाओं के प्रति
लेखनी श्रद्धानत हुई जा रही है
और इस दृश्य में शामिल नेपथ्य में खड़ी कविता
बस मंद मंद मुस्कुरा रही है....

अनुपम भाव लिए खुबशुरत सुंदर रचना लिखी है,
आपने अनुपमा जी,

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

शिखा कौशिक 13 अप्रैल 2012 को 5:10 pm  

bahut sundar .badhai
LIKE THIS PAGE AND WISH INDIAN HOCKEY TEAM FOR LONDON OLYMPIC

शिवम् मिश्रा 13 अप्रैल 2012 को 6:17 pm  

बेहद उम्दा भाव ...

ashish 13 अप्रैल 2012 को 7:00 pm  

अद्भुत

expression 13 अप्रैल 2012 को 7:07 pm  

वाह......

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

बहुत सुंदर अनुपमा..........

शिवम् मिश्रा 13 अप्रैल 2012 को 7:42 pm  

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - किसी अपने के कंधे से कम नहीं कागज का साथ - ब्लॉग बुलेटिन

shalini 13 अप्रैल 2012 को 8:12 pm  

सर्वथा अनोखे विचार लिए एक अनोखी , सुन्दर प्रस्तुति!

Mukesh 13 अप्रैल 2012 को 8:48 pm  

अद्भुत भाव...प्रकृतिस्थ करती हुई...

जब हम हम ना रहे...
जब तुम तुम ना रहो...
अपने साहिल-रहित चिदाकाश
के छतरी के छाँव में...
अपनी चुलबुलाहट छेड़ते...
उन धागों पर मचलते...
जो सदा से जुड़ा था..
आज प्रकाशित हो चला है...
मध्यम सुरों पर...
मध्यम मार्ग से...
मद्धम मुस्कान के...
स्नेहिल बंधन में...!!

जयकृष्ण राय तुषार 14 अप्रैल 2012 को 1:41 am  

बहुत ही अच्छी कविता |

abhi 14 अप्रैल 2012 को 3:22 am  

किसी ने ऐसा तो नहीं ही सोचा होगा जैसा आपने सोचा है!! :) :)
Awesome!! :)

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 14 अप्रैल 2012 को 4:14 am  

मानव प्रकृति से है .. और इस से कितना जूडा है ...तभी उसकी कवितायेँ भी धरती गगन से जुड गयी है...आपकी कविता की रवानगी भी नदिया के सुन्दर कलकल सी है... सादर

Anita 14 अप्रैल 2012 को 11:50 am  

अब भी देखो,
धरती गगन के बहाने अपना ही मन गा रही है
हममें आपमें सांस ले रही महान संभावनाओं के प्रति
लेखनी श्रद्धानत हुई जा रही है
और इस दृश्य में शामिल नेपथ्य में खड़ी कविता
बस मंद मंद मुस्कुरा रही है!
वाह...अनुपमा जी, धरती और गगन के बहाने आपने भी तो आपने मन के कोमल भावों को प्रकट किया है, बहुत सुंदर !

वन्दना 14 अप्रैल 2012 को 12:39 pm  

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!
वाह कितना खूबसूरत ख्याल ………शानदार प्रस्तुति।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 14 अप्रैल 2012 को 1:20 pm  

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
--
संविधान निर्माता बाबा सहिब भीमराव अम्बेदकर के जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
आपका-
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sushila 14 अप्रैल 2012 को 1:48 pm  

"और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!"
बहुत सुंदर !

अनुपमा पाठक 14 अप्रैल 2012 को 2:24 pm  

@ डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक(उच्चारण)जी!
शुभकामनाएं आपको भी!
आभार!

अनुपमा पाठक 14 अप्रैल 2012 को 2:26 pm  

शब्दाशीश हेतु आप सभी का आभार!

ktheLeo 14 अप्रैल 2012 को 4:35 pm  

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

वाह! क्या खूबसूरत और सच्ची बात है!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 14 अप्रैल 2012 को 6:57 pm  

कमाल की सोच है... शायद ही किसी ने उपमाएं गढते वक्त यह सोचा भी होगा!! बहुत सुन्दर और अनोखी सोच!!

Trupti Indraneel 15 अप्रैल 2012 को 5:39 am  

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!

बेहत खूबसूरत !

प्रवीण पाण्डेय 15 अप्रैल 2012 को 6:11 am  

काश प्रकृति में घुल मिल जायें,
हम सब मिलजुल कर हरषायें।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 15 अप्रैल 2012 को 10:35 am  

क्या पता तब हाथों में हाथ डाले
उसी क्षितिज पर धरती अम्बर टहलते हों....

क्या खूब... बहुत सुंदर रचना....
सादर।

आशा जोगळेकर 15 अप्रैल 2012 को 2:12 pm  

तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

जो न सोचे रवि वह सोचे कवि ।
वाह, बेहद सुंदर ।

M VERMA 15 अप्रैल 2012 को 2:21 pm  

आपकी रचनाओं में प्राकृतिक उपालाम्भों का सुन्दर समावेश होता है
बहुत खूबसूरत

महेन्द्र श्रीवास्तव 15 अप्रैल 2012 को 2:46 pm  

बहुत सुंदर
क्या कहने

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 16 अप्रैल 2012 को 6:01 am  

क्षितिज के पार की उड़ान में प्रकृति को पात्रों के बिम्ब में देख कर अलौकिक सुख का अहसास कराती हुई उत्कृष्ट रचना.नि:संदेह अद्भुत है.

DINESH PAREEK 16 अप्रैल 2012 को 9:20 am  

आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

दिगम्बर नासवा 16 अप्रैल 2012 को 10:22 am  

उस पार का स्पंदन महसूस किया है आपकी लेखनी ने और खूबसूरत शब्दों में ढाल दिया है ...

nanditta 17 अप्रैल 2012 को 9:45 pm  

behatariin rachana ke liye aavhaar

जयकृष्ण राय तुषार 18 अप्रैल 2012 को 2:50 am  

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण कविता |

सतीश सक्सेना 18 अप्रैल 2012 को 5:01 am  

कवि की सोंच निराली ...

Dr.NISHA MAHARANA 18 अप्रैल 2012 को 2:13 pm  

कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती sahi bat...

Reena Babbar 20 अप्रैल 2012 को 11:25 am  

ati sundar !

Atul 20 अप्रैल 2012 को 12:00 pm  

हो न हो... होता होगा कुछ ऐसा ही
तभी तो प्रलय नहीं हुआ
और अब तक हम ज़िन्दा हैं!
भले ही
हंस लेने के बहाने
अब चुनिन्दा हैं!

बहुत ही सुन्दर रचना है अनुपमा जी ....

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ