दिखता भले नहीं,
पर ईश्वर यहीं कहीं है!
ये दृश्य का दोष नहीं...
अगर हमारे पास दृष्टि ही नहीं है!
एक भोली सी
मुस्कान में वह है...
कभी महसूस हुई थी जिसमें,
उस ध्यान में वह है...
ज़िन्दा है वह
टूटती हुई सांसों में...
जाते वक़्त होती है जो,
उन अनुभूतियों के फांसो में...
छलकता है वह रोज़
किसी के आंसू बन कर...
मंदिर की सीढ़ियों पर बाट जोहता है
दीन दुखी जिज्ञासु बन कर...
उसकी जिज्ञासा यथावत
बनी ही रहती है
वो खड़ा है इधर फिर ये भक्तों की टोलियाँ
किसे पूजती रहती है
हर आत्मा में स्थित है वो
फिर, साक्षात् खड़े देवों को बिसार कर...
ये कहाँ जा रहा है हुजूम?
किसी प्रस्तर प्रतिमा को अपनी श्रद्धा का आधार कर...!
ईश्वर अचरज से देख रहा है...
मूर्ति पर सुशोभित पीताम्बर!
और इधर घूम रही है धरती अपनी समस्यायों के साथ अपनी धुरी पर
क्या करे? अकेला असहाय नीला अम्बर!
विवेकशील बना कर भेजा उसने...
पर हमारी बुद्धि शायद मंद है!
अन्दर देवालयों में पहुँच तो जाते हैं, पर
श्रद्धा विश्वास तो सब बाहर ही कहीं ताले में बंद है!
अब ईश्वर चुपचाप...
वहीँ सीढ़ियों पर बैठा देख रहा है,
अन्दर भीड़ लगी है...
और बाहर वह कंकड़ चुन कर पुनः उन्हें फेंक रहा है!
कोई तो आये...
भक्त और भगवान का मिलन हो!
चकाचौंध से दूर कोटि-कोटि आत्माएं प्रफुल्लित हो जाएँ...
ऐसी पूजा का चलन हो!
ईश्वर आशान्वित है-
तभी तो उसका रूप धर प्रकृति नाच रही है
मानों अपने ही लय में वह झूमती हुई
ईश-व्यथा बांच रही है...!
ईश-व्यथा!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
22 फ़रवरी 2012

19 टिप्पणियाँ:
कोई तो आये...
भक्त और भगवान का मिलन हो!
चकाचौंध से दूर कोटि-कोटि आत्माएं प्रफुल्लित हो जाएँ...
ऐसी पूजा का चलन हो!
बहुत सुन्दर भाव... कहाँ नहीं है वह...
वाह !!!!!!!!!!!उसकी मोन व्यथा का सुंदर चित्रण !!!!!!!Nirmal paneri
दिखता भले नहीं,
पर ईश्वर यहीं कहीं है!
ये दृश्य का दोष नहीं...
अगर हमारे पास दृष्टि ही नहीं है!
वाह ...बहुत ही बढि़या।
ईश्वर आशान्वित है-
तभी तो उसका रूप धर प्रकृति नाच रही है
मानों अपने ही लय में वह झूमती हुई
ईश-व्यथा बांच रही है...!
आशा के मोती में पिरोई सुंदर रचना ...
पहली चार लाइन बहुत सुन्दर हैं
kalamdaan.blogspot.in
तत्कैशोरँ तच्च वक्त्रारविन्दं तत्कारुण्यं ते च लीलाकटाक्षाः ।
तत्सोन्दर्यं सा च मन्दस्मितश्रीः सत्यं सत्यं दुर्लभं दैवतेषु ॥
Thanks for your fabulous virtue ....in very form of poetry ....
ishwar to humare dil me hai hum kahin kahin use dhoondte hain.
बहुत बढ़िया,बेहतरीन आशा के भाव लिए अच्छी प्रस्तुति,.....
अनुपमा जी,आपने मेरे पोस्ट पर आना ही छोड़ दिया,..
आइये आपका स्वागत है
MY NEW POST...काव्यान्जलि...आज के नेता...
इश्वर के अस्तित्व की झलक दिखाती पोस्ट!!
वह तो अपनी प्रकृति के माध्यम से व्यक्त है...
गहन अभिव्यक्ति...सच है हम ही भटक जाते हैं.....
इश्वर हममें ही है। उसे पहचानने की जरूरत है।
सुंदर रचना।
ईश्वर हर कहीं है। अभिव्यक्ति के सुंदर रूप में इस रचना में भी मौजूद है।
जिधर देखती हूँ उधर तू ही तू है...बहुत सुंदर कविता !
बहुत ही बढ़िया।
सादर
लगता है आपको ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है.
आप उससे बातें करके हमे अहसास करवा रही हैं उसका.
आपकी अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार,अनुपमा जी.
मेरी बात...पर हो सके तो अपनी भी कुछ कहिएगा.
बिलकुल :):)
अब ईश्वर चुपचाप...
वहीँ सीढ़ियों पर बैठा देख रहा है,
अन्दर भीड़ लगी है...
और बाहर वह कंकड़ चुन कर पुनः उन्हें फेंक रहा है!
100% stya..Ultimate
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