अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

धन्य वह जिसने शरणागतवत्सल को पहचाना है!

ये ऐसा ही फ़साना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

हैं यहाँ...

भांति भांति के लोग
भांति भांति के रोग
कलयुगी इस हवा में
निश्चित प्राण जायेंगे सूख

फिर भी गाये जा जो तराना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यहाँ पर...

कैसा रिश्ता कैसे नाते
जो आये सबको देखा जाते
धरती के हिस्से में है
जितनी छाया उतनी धूप

बस मन को भरमाना है
जीवन खोटा सिक्का है
और उसे हर हाल में चलाना है

यही हुआ है...

ऊपर का श्रृंगार रहा
रुखा सूखा उद्गार रहा
जीवन ऊपर ऊपर ही बीत गया
दिखा तो केवल बाहरी रूप

कुछ आत्मा से रिश्ता गहराना है
जीवन दुर्लभ प्रसाद है
इसको उसी रूप में अपनाना है

फिर राह ही राह है
धन्य वह जिसने
शरणागतवत्सल को पहचाना है!

9 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय 28 फ़रवरी 2012 को 3:54 pm  

सच ही है..

मनोज कुमार 28 फ़रवरी 2012 को 5:08 pm  

इस कविता को पढ़कर एक भावनात्मक राहत मिलती है।

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" 28 फ़रवरी 2012 को 5:25 pm  

vaah kya fsaana kesaa khota sikka hai bhtrin bdhaai ho .akhtar khan akela kota rajsthan

vidya 28 फ़रवरी 2012 को 5:58 pm  

कुछ आत्मा से रिश्ता गहराना है
जीवन दुर्लभ प्रसाद है
इसको उसी रूप में अपनाना है

दिखावा ज्यादा दिन टिकता भी नहीं...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 28 फ़रवरी 2012 को 7:46 pm  

जीवन तो चलाना ही है भले ही वो खोटा सिक्का ही क्यों नहो ... अच्छी प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 29 फ़रवरी 2012 को 2:35 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

दिगम्बर नासवा 29 फ़रवरी 2012 को 8:47 am  

सच कह है जीवन खोटा सिक्का ही है ... हमेशा नहीं चलेगा ... समय आयह जब ये दिखा देगा साँसों को ...
गहरे भावों को सहज लिखा है ...

Anita 29 फ़रवरी 2012 को 9:44 am  

ऊपर का श्रृंगार रहा
रुखा सूखा उद्गार रहा
जीवन ऊपर ऊपर ही बीत गया
दिखा तो केवल बाहरी रूप

अब तो भीतर जाना है...बहुत सुंदर भाव!

Atul Shrivastava 29 फ़रवरी 2012 को 7:16 pm  

जीवन तो ऐसा ही होता है।

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