मुड़ कर देखने का उसे अवकाश नहीं

रो लें जी-भर कर
सर दे मारें दीवारों पर


पर
ज़िन्दगी मजबूर है क्या ?!
जो आँसू पोंछगी
गले लगाएगी ?!


अरे!
वह तो
अपनी धुन में चलती है
अपनी ही धुन में
चलती चली जाएगी!

मुड़ कर देखने का 

उसे अवकाश नहीं 

हमारा मन पढ़ ले 

ये उसका अन्दाज़ नहीं 


ख़ुद हमें ही घुटनों की धूल झाड़
आगे बढ़ना होता है
उसका साथ बना रहे इसके लिए
परिस्थितियों की दुर्गम पहाड़ियों को चढ़ना होता है 


इतना सब करते हुए
अपने आप पर किया विश्वास फलित होता है
ज़िंदगी अपना लेती है
कि कभी-कभी उसका मन भी द्रवित होता है ! 

4 टिप्पणियाँ:

kya hai kaise 14 जून 2019 को 7:14 am बजे  

खूबसूरत पंक्तियाँ

Anita 14 जून 2019 को 11:13 am बजे  

सदा की तरह सुंदर भाव...विश्वास ही तो जिंदगी है..

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 14 जून 2019 को 5:15 pm बजे  

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रक्तदान करके बनें महादानी : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 14 जून 2019 को 6:35 pm बजे  

जिन्दगी तो अपना ही लेती है . अच्छी कविता

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ