कितने-कितने छल

रिश्तों में इतना छल है
निहित स्वार्थों का पूरा दल-बल है
ऐसे में चल ज़िन्दगी तू कैसे चलती है
हर क्षण यहाँ प्रतिबद्धताएँ बदलती हैं

आँखों में जो पानी है 

उसकी अलग कहानी है 


नसों में दौड़ते लहू की थिरकन 

थम जाती है 

सम्बन्धों की मरीचिका 

रह-रह कर ऐसे रूप धर प्रकट हो आती है   



ज़िन्दगी क्या करे
बस चलती है
छली जाए तो छली जाए
टूट कर फिर सँवरती है!

5 टिप्पणियाँ:

अनीता सैनी 28 जून 2019 को 11:07 am बजे  

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29 -06-2019) को "जग के झंझावातों में" (चर्चा अंक- 3381) पर भी होगी।

--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है

….
अनीता सैनी

Anita 29 जून 2019 को 5:53 am बजे  

दुःख मन को मांजता है..और साफ-सुथरा मन ही सुख को धारण कर सकता है..

Onkar 29 जून 2019 को 6:20 am बजे  

बहुत बढ़िया

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 29 जून 2019 को 1:48 pm बजे  

जिन्दगी और रिश्तों का मोह पल पल छलता है हमें . सुन्दर अभिव्यक्ति

मन की वीणा 30 जून 2019 को 11:07 am बजे  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति गहराई समेटे संवेदनशील।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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