पिता के लिए

तुम
अपनी आँखों की नमी में
हमें रोता हुआ पाओगे


विदा कर दोगे हमें
मगर हम वहीं कहीं छूटे हुए रह जाने हैं
सदा के लिए


तुम्हारे आँगन में जो चलना सीखा
उस सीख के सहारे
जीवन अरण्य की सकल दुर्गमता पार करेंगे


हम हमेशा 

तुम्हारे घर के कोने-कोने में बसी 

यादों में रहेंगे


और तुम
हमारा विश्वास बन
हमारी प्रेरणाओं का आधार रहोगे


अबोध पहले क्षणों सा ही
तुम आजन्म
हमारा संसार रहोगे!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 17 जून 2019 को 7:26 am बजे  

बच्चों से उनका आंगन कभी नहीं छूटता और माता-पिता से उनके भीतर का अजस्र स्नेह..पितृ दिवस पर बेहतरीन रचना..अनुपमा जी आपकी कलम में दिनोंदिन निखार आ रहा है..बहुत बहुत शुभकामनायें !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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