ठूँठ और हम

टूट कर गिरे हुए ठूँठ ने
हमें अपनी ही याद दिलाई 


टूटना, बिखरना, फिर भी बने रहना
यही जीवन की सच्चाई 


कि आज टूटी हैं
तो कल हरी भी होंगी 


प्राथमिकताओं के भँवर में
बातें कुछ खरी-खरी भी होंगी 


ठूँठ होने की प्रक्रिया
वापस हरेपन तक लौटेगी  


कि चक्रवत है सब

ज़िंदगी सूनेपन को जीती हुई एक रोज़ खिलखिलाहटों को जीतेगी !!







4 टिप्पणियाँ:

Anita 12 जून 2019 को 5:34 am बजे  

जीवन की एक सच्चाई को जीती हुई कविता..

डॉ. दिलबागसिंह विर्क 12 जून 2019 को 4:24 pm बजे  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3365 दिया जाएगा

धन्यवाद

शुभा 12 जून 2019 को 5:58 pm बजे  

वाह!!बहुत खूब!

kya hai kaise 14 जून 2019 को 7:53 am बजे  

अति सुंदर लेख

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
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आज कैसे
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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