साक्षी

तारों भरे आसमान में
एक तारे पर नजर टिकाये गुजरी रात
रिश्तों का
अलौकिक ताना-बाना
बुनती है


कि
हम अकेले नहीं हैं


कि
हमारा क्षण-क्षण का संघर्ष
हमारे प्रतिपल के संकल्प
हमारे हमराह हैं


और
वह तारा
हमारी जूझन-टूटन का साक्षी!

5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 25 जून 2019 को 7:20 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (26-06-2019) को "करो पश्चिमी पथ का त्याग" (चर्चा अंक- 3378) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 25 जून 2019 को 9:37 am बजे  

वाह ! तारों से दोस्ती और अस्तित्त्व को साक्षी बना लेने की कला..इसे यदि कोई संघर्ष कहता है तो फिर आनंद किस चिड़िया का नाम है

शुभा 26 जून 2019 को 7:27 am बजे  

वाह!लाजवाब!!

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 26 जून 2019 को 7:51 am बजे  

सभी गतिमान हैं .वाह .... पर्वत भी नदियों के रूप में

सु-मन (Suman Kapoor) 27 जून 2019 को 11:51 am बजे  

बहुत दिन बाद पढ़ा आपको या यूँ कहूँ साल ही हो गया ....पर एहसास वही है जो दिल को छू जाते हैं

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