हरेपन का गीत

सब रस्में
निबाही जातीं है


क्या स्याह क्या सुफ़ेद
धरा पर प्रतिपल नयी-सी सुबहें आतीं हैं


बादल अपने दल-बल संग
नित रूप नया धरते हैं


धरा के आँचल में
हरी धारियों की सौभाग्यशाली उपस्थिति हो
इस ध्येय हेतु वे कितने करतब करते हैं


रात बीतती है, बीते
अब सुबह आए


धरती निर्द्वंद, अपने हरेपन के, गीत गाए!


2 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 9 जून 2019 को 10:55 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (10-06-2019) को "बेरोजगारी एक सरकारी आंकड़ा" (चर्चा अंक- 3362) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 10 जून 2019 को 7:00 am बजे  

सुंदर प्रार्थना

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ