हे ईश्वर!

सब
विनष्ट हो जाए
फिर नया सृजन हो


एक ही तरह के दुःख से
आहत है मन
नये-नये दुःखों का
हे ईश्वर! अब आगमन हो

2 टिप्पणियाँ:

डॉ. दिलबागसिंह विर्क 5 जून 2019 को 5:15 pm बजे  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 06.06.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3358 में दिया जाएगा

धन्यवाद

Anita 6 जून 2019 को 6:08 am बजे  

दुखों की प्रार्थना ही करनी है तो ईश्वर का क्या काम..जो आनंद के सिवा कुछ दे ही नहीं सकता, दुखों के निर्माण का ठेका तो आदमी ने कब का ले रखा है

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ