प्रगल्भता की ओर

यात्रा में
टिक कर खड़े होने को

जैसे हैं
उससे बड़े होने को


छाँव की परिभाषा आनी चाहिए


धूप की उजली आभा भी
मन ही मन हिय में बसानी चाहिए


कि
धूप-छाँव के खेल
बाहर जितने निर्दयी है
मन के भीतर भी
वैसी ही निर्ममता बरतते हैं


इन विकट समीकरणों को जी लेने की कलात्मकता
जीवन में भी निभानी चाहिए


आँखों में नमी हो
हृदय को भी नमी की भाषा आनी चाहिए!




6 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 23 जून 2019 को 7:35 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-06-2019) को "-- कैसी प्रगति कैसा विकास" (चर्चा अंक- 3376) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 23 जून 2019 को 8:54 am बजे  

बहुत खूब

शिवम् मिश्रा 23 जून 2019 को 5:40 pm बजे  

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 23/06/2019 की बुलेटिन, " अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी की ११८ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

विश्वमोहन 24 जून 2019 को 4:34 am बजे  

छांव की लंबाई और आंखों की नमी तो बाहर दिखने वाले भ्रम मात्र हैं। यथार्थ तो बिम्ब और हिया की हलचल ही है।

Anita 24 जून 2019 को 5:30 am बजे  

अंतर की नमी ही सरस रखेगी मन की भूमि को जिसमें एक दिन उल्लास के कुसुम खिलेंगे..

वाणी गीत 24 जून 2019 को 12:03 pm बजे  

आँखों की बात हृदय से निकले तो बात है...
खूब !

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