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इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक
at
9 जून 2019
कुछ देर का जलना
फिर
बुझ जाना
दिव्य है
प्रार्थनारत लौ-सा
दुर्लभ जीवन पाना
क्षणिकता के सौंदर्य को
कर आत्मसात
मुस्कुराना
कर्कशताओं को झेलते हुए
मृदुता की
वांछित मिशाल बन पाना
सच, इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना !
1 टिप्पणियाँ:
Anita
10 जून 2019 को 7:20 am बजे
सुना है, क्षण भंगुर पर नजर टिकी रही तो मुश्किल है..उसके पार गये तो जरा भी नहीं..
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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"
इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!
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सुना है, क्षण भंगुर पर नजर टिकी रही तो मुश्किल है..उसके पार गये तो जरा भी नहीं..
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