इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना

कुछ देर का जलना
फिर
बुझ जाना


दिव्य है
प्रार्थनारत लौ-सा
दुर्लभ जीवन पाना


क्षणिकता के सौंदर्य को
कर आत्मसात 
मुस्कुराना 


कर्कशताओं को झेलते हुए
मृदुता की
वांछित मिशाल बन पाना 


सच, इतना आसाँ नहीं जीवन कहलाना !

1 टिप्पणियाँ:

Anita 10 जून 2019 को 7:20 am बजे  

सुना है, क्षण भंगुर पर नजर टिकी रही तो मुश्किल है..उसके पार गये तो जरा भी नहीं..

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ