सूरज और दीया-बाती

वो
डूबते हुए
अपनी थाती


बाती को सौंप गया।


बाती ने
मिट्टी की काया को
आधार किया


अंधियारे में
रोशनी की नाव ने
यूँ दर्द का सागर पार किया।

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 7 जून 2019 को 7:01 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-06-2019) को "सांस लेते हुए मुर्दे" (चर्चा अंक- 3360) (चर्चा अंक-3290) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 8 जून 2019 को 8:26 am बजे  

बहुत बढ़िया

Onkar 8 जून 2019 को 1:00 pm बजे  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
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