भ्रामक समीकरणों को जीतती मुस्कानें

सुख-दुःख के समीकरण
भ्रामक थे 


मुस्कुराहटों के कोलाज़ ने
भ्रम की उघरन को
भरसक सिया 


मस्कुराहटों के वे अनगिन बिम्ब
प्रकृति माँ ने हमें
सहर्ष दिया-


खिलते फूलों के रूप में
खिलती हुई धूप में 


खिले हुए अपने कई रोमांचक प्रतिरूप में।


1 टिप्पणियाँ:

Onkar 15 जून 2019 को 9:27 am बजे  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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