अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

साध रहे हो, साधे रहना मौन...

मत कहना कुछ भी
रहना चुप ही...
कि चुप्पियों के देश के वासी हैं हम...
हमारे आंसू, हमारी आँखें
मुस्कुराता रहे इनमें...
सदा सारा गम...


मौन का स्वर
सालता है...
पर है यही
जो कितनी ही अनहोनियाँ
टालता है...


इसलिए, 


साधे रहना मौन
शायद उचित यही होगा...
कि उसे कितना मानते हैं हम
ये तो अभीष्ट को सूचित ही होगा... !!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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