अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

छोटी छोटी अनुभूतियों का आकाश...

धूप रच रही थी
सुनहरी आभा...


धवल धरा के आँचल में चमकती 

हीरे सी शोभा...


ऐसे क्षण को जी पाना...
एक बेहद सामान्य से दिन को
ख़ास कर सकता है...


ख़ास कर गया... !


बर्फ़ की चादर बिछी हुई है...
धूप भी गाहे बगाहे रोज़ आती होगी...


रोज़ बुनी जाती होगी चमक...


पर उन्हें महसूसने से हम चूक जाते हैं...


कम ही होता है न
बस यूँ ही उस सान्निध्य को महसूसना
जो हम सबके हिस्से खूब आते हैं...


ज़रा सा अवकाश रहे...
आँखों के आगे छोटी छोटी अनुभूतियों का आकाश रहे...


ख़ुशी खिली रहेगी...
दुर्लभ तो है मगर ऐसे ही अनायास मिलती है...
अनाम ठिकानों पर मिलेगी... !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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