अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हर एक झरोखा बंद था...


बिखरे हुए मन को
समेटना...
क्योंकर होता...
कैसे होता... ?!!


सब तार टूटे थे....
विडम्बनाओं का काफ़िला
दूर तक फैला था...


दर्द कई रूप धरे
विद्यमान था...


दुःख कई थे...


सुख और दुःख के बीच की सीमा रेखा का
कुछ यूँ हुआ था विलय...
कि सुख और दुःख
अनन्य अविभाज्य से थे दृश्यमान...


आंसुओं की सहज उपस्थिति ने
सुख दुःख के आँचल नम कर रखे थे...


शब्द कुछ कहते हुए
कुछ और अभिव्यक्त कर जाते थे...
उनकी अपनी सीमा थी... 


मौन अपनी तरह से संतप्त था...


हर एक झरोखा बंद था...
रूठा था प्रकाश...


बरस रहा था हृदयाकाश... !!



2 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय 19 जनवरी 2016 को 11:52 am  

हृदय को इतना विस्तार मिले कि सब भाव उसमें स्थान पा सकें।

Onkar 19 जनवरी 2016 को 4:52 pm  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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