अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

डाल-डाल, हरे रंग का, दर्द उगा है... !!

डाल-डाल, हरे रंग का, दर्द उगा है...
दुनिया है, यहाँ कोई न किसी का, सगा है...


पराये हैं शब्द,
भावों की ज़मीन पर लेकिन,
अर्थ समर्थ इनमें ही पगा है...


सत्य को कर आत्मसात,
भावविह्वल हृदयाकाश,
बेतरह बरसने लगा है...


सोये हुए हैं सब,
चिरनिद्रा में लीन हो ही जाना है एक दिन,
समय रहते विरले ही कोई जगा है...


भ्रम में ही जीता है इंसान,
ये विडंबना ही है कि अंत तक रहस्य बना रहता है,
कि उसने जीवन को या जीवन ने उसे ठगा है...


पात-पात, गिरती बूंदों में, वही सरगम पगा है...
दुनिया है, यहाँ कोई न किसी का, सगा है... !!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 11 जनवरी 2016 को 4:18 am  

अंत तक क्यों इसी पल रहस्य से पर्दा उठ सकता है मगर कोई जानना चाहे तब तो..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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