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डाल-डाल, हरे रंग का, दर्द उगा है... !!
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक
at
8 जनवरी 2016
डाल-डाल, हरे रंग का, दर्द उगा है...
दुनिया है, यहाँ कोई न किसी का, सगा है...
पराये हैं शब्द,
भावों की ज़मीन पर लेकिन,
अर्थ समर्थ इनमें ही पगा है...
सत्य को कर आत्मसात,
भावविह्वल हृदयाकाश,
बेतरह बरसने लगा है...
सोये हुए हैं सब,
चिरनिद्रा में लीन हो ही जाना है एक दिन,
समय रहते विरले ही कोई जगा है...
भ्रम में ही जीता है इंसान,
ये विडंबना ही है कि अंत तक रहस्य बना रहता है,
कि उसने जीवन को या जीवन ने उसे ठगा है...
पात-पात, गिरती बूंदों में, वही सरगम पगा है...
दुनिया है, यहाँ कोई न किसी का, सगा है... !!
1 टिप्पणियाँ:
Anita
11 जनवरी 2016 को 4:18 am बजे
अंत तक क्यों इसी पल रहस्य से पर्दा उठ सकता है मगर कोई जानना चाहे तब तो..
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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"
इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!
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वो कल भी वहीं था, आज भी वहीं है...
काश...
हर एक झरोखा बंद था...
नदी की तरह...
सच ही कहती थीं अश्रु लड़ियाँ...
हम भी वहीं कहीं होंगे...
छोटी छोटी अनुभूतियों का आकाश...
ज़िन्दगी के खेल में...
एक इंतज़ार उग आया है...
काश...
डाल-डाल, हरे रंग का, दर्द उगा है... !!
कुछ प्रश्नों का कहीं हल नहीं है... !!
मझधार में अटकेगी या पार उतरेगी... ?
दुरुहताओं के बीच...
नमन शहीदों को...
संभावनाओं के नाम... !!
एक पुराने दिन का चाँद...
अब आजीवन रहना यायावर !!
साध रहे हो, साधे रहना मौन...
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ओस से, आशाएँ लिखता, मन है... !!
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