अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नदी की तरह...

वही मूक
कभी वही वाचाल...
मन है
पहाड़ों से उतरती
किसी नदी की तरह... 


कहते कहते
गला रुंध गया...
गुज़र रहे थे
गुज़रते रहे लम्हे
किसी सदी की तरह...


आँखों में
सागर लिए...
बहते रहे हम
अन्यान्य पड़ावों से गुज़रती
किसी नदी की तरह... 


ज़िन्दगी आद्यांत एक सफ़र है...
हर क्षण खुद से ही एक जिरह... !!





3 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 17 जनवरी 2016 को 2:44 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-01-2016) को "देश की दौलत मिलकर खाई, सबके सब मौसेरे भाई" (चर्चा अंक-2225) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar 17 जनवरी 2016 को 6:36 pm  

वाह, बहुत सुंदर और सच भी।

प्रवीण पाण्डेय 19 जनवरी 2016 को 3:27 am  

अद्भुत पंक्तियाँ, सहज साम्य जीवन और नदी के बीच।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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