अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अब आजीवन रहना यायावर !!


घर कभी कभी बहुत बहुत दूर लगता है मुझे...
बचपन का आँगन जो छूटा
तो लौट कर भी उस तक लौट पाने की जैसे हर आस टूट गयी...


जब सुहानी चलती है हवा
खुशगवार होता है मौसम 


तब कई बार ऐसा लगता है...
कुछ नहीं टूटा
कुछ नहीं छूटा 


जब चाहें वहां उसी पुराने अंदाज़ में हो सकते हैं हम 


पर तभी
यथार्थ के धरातल पर पटक दी जाती हैं
उड़ती हुई कोमल भावनाएं...


और जान लेते हैं हम...
अपना सच पहचान लेते हैं हम...


बंट गया समय
बंट गए हैं हम


पहले जैसी अब नहीं रही
तलुओं तले की घास नम 


घर दूर चमकता ध्रुवतारा है...
आँखों में उससे ही उजियारा है...


उस तक वैसे ही
आज़ाद पंछी की तरह नहीं जा सकते
तो हमें कहीं नहीं जाना है...


हम कहीं के नहीं हैं
हर शय से मन बेगाना है...


मन! जो छूट ही गया तुझसे घर
तो अब आजीवन रहना यायावर !!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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