अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कभी आँखों में उजास भी हो...


उदास डाल पर
श्वेत पंखुड़ियों ने अवतरित हो कर
रिसते दर्द को
थाम लिया... !!


समूचा वातावरण जमा हुआ था...
बर्फ़ की चादर से ढंकी थी धरा...
ऐसी ही किसी मर्मान्तक सफ़ेदी ने जैसे
भावनाओं को भी ढँक दिया हो...
लुप्त था स्पंदन...
ऐसे में अहर्निश चलता रहा क्रंदन...


सूरज भी नहीं था...
धरा किरणों की बाट जोह रही थी...


ऐसे नीरस माहौल में कैसे खिलता फूल...
चुभ रहे थे चुभने ही हैं शूल...


लेकिन
सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद
अपने गमले की उष्णता से
ग्रहण कर जिजीविषा
खिल आया एक फूल...


उसकी छवि ने
मन के गमले को सिंचित करने की नींव डाली...
झाड़ी हमने धूल...


बहुत नमी है आँखों में...
सींच लेंगे इनसे ही मन की माटी...


ये जगत है न...
यहाँ स्वार्थ के कारागार में कैद है आत्मा...
एक दूसरे के आंसू पोंछने की कभी कहाँ रही भी है यहाँ परिपाटी...


खुद से ही खुद को थामना है...


कभी आँखों में उजास भी हो...
उदास रहना जीवन की अवमानना है... !!

2 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 21 जनवरी 2016 को 9:45 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (22.01.2016) को "अन्तर्जाल का सात साल का सफर" (चर्चा अंक-2229)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

संजय भास्‍कर 3 फ़रवरी 2016 को 5:49 pm  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016 को ( पाँच लिंकों का आनन्द ) http://halchalwith5links.blogspot.in पर ( अंक - 202 ) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें ब्लॉग पर आपका स्वागत है -- धन्यवाद ।

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ