अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो कल भी वहीं था, आज भी वहीं है...

रास्ते हमेशा अकेले होते हैं...
हमेशा से अकेले हैं...


आस्था विश्वास की हरियाली कहीं थाम लेती है
तो कहीं होता है मरुभूमि सा सूनापन 


प्रारब्ध ने रचे हैं व्यतिक्रम...


रास्तों की नियति है चलते जाना...
और अंतिम मोड़ पर ठगा सा रह जाना...


उन पर चलकर
मुसाफ़िर मंज़िल पा जाते हैं...
रास्ता कहीं नहीं पहुँचता...


वो कल भी वहीं था...
आज भी वहीं है...


यात्रा है कि अहर्निश चल रही है... !!

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इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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